Sunday, 7 August 2016

नाथूराम गोडसे के आखिरी बयान

नाथूराम गोड़से ने गांधी हत्या के पक्ष में अपनी 150 दलीलें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुति की | प्रस्तुत है “नाथूराम गोड़से के वक्तव्य के मुख्य अंश”
1. नाथूराम का विचार था कि गांधी जी की अहिंसा हिन्दुओं को कायर बना देगी |कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी को मुसलमानों ने निर्दयता से मार दिया था महात्मा गांधी सभी हिन्दुओं से गणेश शंकर विद्यार्थी की तरह अहिंसा के मार्ग पर चलकर बलिदान करने की बात करते थे | नाथूराम गोड़से को भय था गांधी जी की ये अहिंसा वाली नीति हिन्दुओं को कमजोर बना देगी और वो अपना अधिकार कभी प्राप्त नहीं कर पायेंगे |

2. 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोलीकांड के बाद से पुरे देश में ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ आक्रोश उफ़ान पर था | भारतीय जनता इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाने की मंशा लेकर गांधी जी के पास गयी लेकिन गांधी जी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से साफ़ मना कर दिया।

3. महात्मा गांधी ने खिलाफ़त आन्दोलन का समर्थन करके भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिकता का जहर घोल दिया | महात्मा गांधी खुद को मुसलमानों का हितैषी की तरह पेश करते थे वो केरल के मोपला मुसलमानों द्वारा वहाँ के 1500 हिन्दूओं को मारने और 2000 से अधिक हिन्दुओं को मुसलमान बनाये जाने की घटना का विरोध तक नहीं कर सके |

4. कांग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से काँग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गांधी जी ने अपने प्रिय सीतारमय्या का समर्थन कर रहे थे | गांधी जी ने सुभाष चन्द्र बोस से जोर जबरदस्ती करके इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया |

5. 23 मार्च 1931 को भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी गयी | पूरा देश इन वीर बालकों की फांसी को टालने के लिए महात्मा गांधी से प्रार्थना कर रहा था लेकिन गांधी जी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए देशवासियों की इस उचित माँग को अस्वीकार कर दिया।

6. गांधी जी कश्मीर के हिन्दू राजा हरि सिंह से कहा कि कश्मीर मुस्लिम बहुल क्षेत्र है अत: वहां का शासक कोई मुसलमान होना चाहिए | अतएव राजा हरिसिंह को शासन छोड़ कर काशी जाकर प्रायश्चित करने | जबकि  हैदराबाद के निज़ाम के शासन का गांधी जी ने समर्थन किया था जबकि हैदराबाद हिन्दू बहुल क्षेत्र था | गांधी जी की नीतियाँ धर्म के साथ, बदलती रहती थी | उनकी मृत्यु के पश्चात सरदार पटेल ने सशक्त बलों के सहयोग से हैदराबाद को भारत में मिलाने का कार्य किया | गांधी जी के रहते ऐसा करना संभव नहीं होता |

7. पाकिस्तान में हो रहे भीषण रक्तपात से किसी तरह से अपनी जान बचाकर भारत आने वाले विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली | मुसलमानों ने मस्जिद में रहने वाले हिन्दुओं का विरोध किया जिसके आगे गांधी नतमस्तक हो गये और गांधी ने उन विस्थापित हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

8. महात्मा गांधी ने दिल्ली स्थित मंदिर में अपनी प्रार्थना सभा के दौरान नमाज पढ़ी जिसका मंदिर के पुजारी से लेकर तमाम हिन्दुओं ने विरोध किया लेकिन गांधी जी ने इस विरोध को दरकिनार कर दिया | लेकिन महात्मा गांधी एक बार भी किसी मस्जिद में जाकर गीता का पाठ नहीं कर सके |

9. लाहौर कांग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से विजय प्राप्त हुयी किन्तु गान्धी अपनी जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया | गांधी जी अपनी मांग को मनवाने के लिए अनशन-धरना-रूठना किसी से बात न करने जैसी युक्तियों को अपनाकर अपना काम निकलवाने में माहिर थे | इसके लिए वो नीति-अनीति का लेशमात्र विचार भी नहीं करते थे |

10. 14 जून 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, लेकिन गांधी जी ने वहाँ पहुँच कर प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि गांधी जी ने  स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा। न सिर्फ देश का विभाजन हुआ बल्कि लाखों निर्दोष लोगों का कत्लेआम भी हुआ लेकिन गांधी जी ने कुछ नहीं किया |

11. धर्म-निरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के जन्मदाता महात्मा गाँधी ही थे | जब मुसलमानों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाये जाने का विरोध किया तो महात्मा गांधी ने सहर्ष ही इसे स्वीकार कर लिया और हिंदी की जगह हिन्दुस्तानी (हिंदी + उर्दू की खिचड़ी) को बढ़ावा देने लगे | बादशाह राम और बेगम सीता जैसे शब्दों का चलन शुरू हुआ |

12. कुछ एक मुसलमान द्वारा वंदेमातरम् गाने का विरोध करने पर महात्मा गांधी झुक गये और इस पावन गीत को भारत का राष्ट्र गान नहीं बनने दिया |

13. गांधी जी ने अनेक अवसरों पर शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोबिन्द सिंह को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा। वही दूसरी ओर गांधी जी मोहम्मद अली जिन्ना को क़ायदे-आजम कहकर पुकारते थे |

14. कांग्रेस ने 1931 में स्वतंत्र भारत के राष्ट्र ध्वज बनाने के लिए एक समिति का गठन किया था इस समिति ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र को भारत का राष्ट्र ध्वज के डिजाइन को मान्यता दी किन्तु गांधी जी की जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

15. जब सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया तब गांधी जी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर  सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

16. भारत को स्वतंत्रता के बाद पाकिस्तान को एक समझौते के तहत 75 करोड़ रूपये देने थे भारत ने 20 करोड़ रूपये दे भी दिए थे लेकिन इसी बीच 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने कश्मीर पर आक्रमण कर दिया | केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल ने आक्रमण से क्षुब्ध होकर 55 करोड़ की राशि न देने का निर्णय लिया | जिसका महात्मा गांधी ने विरोध किया और आमरण अनशन शुरू कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 55 करोड़ की राशि भारत ने पाकिस्तान दे दी ।

महात्मा गांधी भारत के नहीं अपितु पाकिस्तान के राष्ट्रपिता थे जो हर कदम पर पाकिस्तान के पक्ष में खड़े रहे, फिर चाहे पाकिस्तान की मांग जायज हो या नाजायज | गांधी जी ने कदाचित इसकी परवाह नहीं की |

उपरोक्त घटनाओं को देशविरोधी मानते हुए नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या को न्यायोचित ठहराने का प्रयास किया | नाथूराम ने न्यायालय में स्वीकार किया कि माहात्मा गांधी बहुत बड़े देशभक्त थे उन्होंने निस्वार्थ भाव से देश सेवा की | मैं उनका बहुत आदर करता हूँ लेकिन किसी भी देशभक्त को देश के टुकड़े करने के ,एक समप्रदाय के साथ पक्षपात करने की अनुमति नहीं दे सकता हूँ | गांधी जी की हत्या के सिवा मेरे पास कोई दूसरा उपाय नहीं था |

नाथूराम गोड़से द्वारा अदालत में दिए बयान के मुख्य अंश…..

मेने गांधी को नहीं मारा; मेने गांधी का वध किया है, गांधी वध…वो मेरे दुश्मन नहीं थे, परन्तु उनके निर्णय राष्ट्र के लिए घातक साबित हो रहे थे। जब व्यक्ति के पास कोई रास्ता न बचे तब वह मज़बूरी में सही कार्य के लिए गलत रास्ता अपनाता है।मुस्लिम लीग और पाकिस्तान निर्माण की गलत निति के प्रति गांधीजी की सकारात्मक प्रतिक्रिया ने ही मुझे मजबूर किया।पाकिस्तान को 55 करोड़ का भुगतान  करने की गैरवाजिब मांग को लेकर गांधी जी अनशन पर बैठे।बटवारे में पाकिस्तान से आ रहे हिन्दुओ की आपबीती और दुर्दशा  ने मुझे हिला के रख दिया था।अखंड हिन्दू राष्ट्र गांधी जी के कारण मुस्लिम लीग के आगे घुटने  टेक रहा  था।बेटो के सामने माँ का खंडित होकर टुकड़ो में बटना विभाजित होना असहनीय था, अपनी ही धरती पर हम परदेशी बन गए थे।मुस्लिम लीग की सारी गलत मांगो को गांधी जी मानते जा रहे थे।मैंने  ये निर्णय किया कि  भारत माँ को अब और विखंडित और दयनीय स्थिति में नहीं होने देना है, तो मुझे गांधी को मारना ही होगा और मैंने इसलिए गांधी को मारा…..मुझे पता हे इसके लिए मुझे फ़ासी होगी, मैं  इसके लिए भी तैयार हु और हाँ, यदि मातृभूमि की रक्षा करना अपराध है  तो मैं  यह अपराध बार बार करूँगा हर बार करूँगाऔर जब तक सिन्ध नदी पुनः अखंड हिन्द में न बहने लगे तब तक मेरी अस्थियो का विसर्जन नहीं करना।मुझे फ़ासी देते वक्त मेरे एक हाथ में केसरिया  ध्वज और दूसरे हाथ में अखंड भारत का नक्शा हो मैं  फ़ासी चढ़ते वक्त अखंड भारत की जय जय बोलना चाहूँगाहे भारत माँ मुझे दुःख हे मैं  तेरी इतनी ही सेवा कर पाया….(नाथूराम गोडसे)विभाजन के समय हुआ क्या क्या ?विभाजन के लिए क्या था विभिन्न राजनैतिक पार्टियों दृष्टिकोण ?क्या थी पीड़ा पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों की … मदन लाल पाहवा और विष्णु करकरे की?

क्या थी गोडसे की विवशता ?

क्या गोडसे नही जानते थे की आम आदमी को मरने में और एक राष्ट्रपिता को मरने में क्या अंतर है ?

क्या होगा परिवार का ?

कैसे कैसे कष्ट सहने पड़ेंगे परिवार और सम्बन्धियों को और मित्रों को ?

क्या था गांधी वध का वास्तविक कारण ?

क्या हुआ 30 जनवरी की रात्री को … पुणे के ब्राह्मणों के साथ ?

क्या था सावरकर और हिन्दू महासभा का चिन्तन ?

क्या हुआ गोडसे के बाद नारायण राव आप्टे का .. कैसी नृशंस फांसी दी गयी उन्हें l

यह लेख पढने के बाद कृपया बताएं कैसे उतारेगा भारतीय जनमानस हुतात्मा नाथूराम गोडसे जी का कर्ज….

आइये इन सब सवालों के उत्तर खोजें ….

पाकिस्तान से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी, उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं.अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे, गला कटे हुए lरेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे, डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थी l बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे, रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था,,” आज़ादी का तोहफा ” रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई

थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था, दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ा l ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर, उन पर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की… भयानक बदबू……

सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं, उनके घर, उनकी खेती, पैसा-अडका, सोना-चाँदी, बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थे l मुस्लिम लीग ने सिवाय कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी. किसी भी गाडी पर हमला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं- बच्चियों को भगाया गया.बलात्कार किये बिना एक भी हिन्दू स्त्री वहां से वापस नहीं आ सकती थी … बलात्कार किये बिना…..?

जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आई वो अपनी वैद्यकीय जांच करवाने से डर रही थी….

डॉक्टर ने पूछा क्यों ???

उन महिलाओं ने जवाब दिया… हम आपको क्या बताये हमें क्या हुआ हैं ?

हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं हमें भी पता नहीं हैं…उनके सारे शारीर पर चाकुओं के घाव थे.

“आज़ादी का तोहफा”

जिन स्थानों से लोगों ने जाने से मना कर दिया, उन स्थानों पर हिन्दू स्त्रियों की नग्न यात्राएं (धिंड) निकाली गयीं, बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं और उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया l

1947 के बाद दिल्ली में 400000 हिन्दू निर्वासित आये, और इन हिन्दुओं को जिस हाल में यहाँ आना पड़ा था, उसके बावजूद पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने ही चाहिए ऐसा महात्मा गाँधी जी का आग्रह था…क्योकि एक तिहाई भारत के तुकडे हुए हैं तो भारत के खजाने का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान को मिलना चाहिए था l

विधि मंडल ने विरोध किया, पैसा नहीं देगे….और फिर बिरला भवन के पटांगन में महात्मा जी अनशन पर बैठ गए…..पैसे दो, नहीं तो मैं मर जाउगा….एक तरफ अपने मुहँ से ये कहने वाले महात्मा जी, की हिंसा उनको पसंद नहीं हैं l दूसरी तरफ जो हिंसा कर रहे थे उनके लिए अनशन पर बैठ गए… क्या यह हिंसा नहीं थी .. अहिंसक आतंकवाद की आड़ में

दिल्ली में हिन्दू निर्वासितों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी, इससे ज्यादा बुरी बात ये थी की दिल्ली में खाली पड़ी मस्जिदों में हिन्दुओं ने शरण ली तब बिरला भवन से महात्मा जी ने भाषण में कहा की दिल्ली पुलिस को मेरा आदेश हैं मस्जिद जैसी चीजों पर हिन्दुओं का कोई ताबा नहीं रहना चाहिए l निर्वासितों को बाहर निकालकर मस्जिदे खाली करे..क्योंकि महात्मा जी की दृष्टी में जान सिर्फ मुसलमानों में थी हिन्दुओं में नहीं…

जनवरी की कडकडाती ठंडी में हिन्दू महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों को हाथ पकड़कर पुलिस ने मस्जिद के बाहर निकाला, गटर के किनारे रहो लेकिन छत के निचे नहीं l क्योकि… तुम हिन्दू हो….

4000000 हिन्दू भारत में आये थे,ये सोचकर की ये भारत हमारा हैं….ये सब निर्वासित गांधीजी से मिलाने बिरला भवन जाते थे तब गांधीजी माइक पर से कहते थे क्यों आये यहाँ अपने घर जायदाद बेचकर, वहीँ पर अहिंसात्मक प्रतिकार करके क्यों नहीं रहे ??

यही अपराध हुआ तुमसे अभी भी वही वापस जाओ..और ये महात्मा किस आशा पर पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने निकले थे?

कैसा होगा वो मोहनदास करमचन्द गाजी उर्फ़ गंधासुर … कितना महान … जिसने बिना तलवार उठाये … 35 लाख हिन्दुओं का नरसंहार करवाया

2 करोड़ से ज्यादा हिन्दुओं का इस्लाम में धर्मांतरण हुआऔर उसके बाद यह संख्या 10 करोड़ भी पहुंची l
10 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को खरीदा बेचा गया l

20 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया, तरह तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाओं के बाद
ऐसे बहुत से प्रश्न, वास्तविकताएं और सत्य तथा तथ्य हैं जो की 1947 के समकालीन लोगों ने अपनी आने वाली पीढ़ियों से छुपाये, हिन्दू कहते हैं की जो हो गया उसे भूल जाओ, नए कल की शुरुआत करो …
परन्तु इस्लाम के लिए तो कोई कल नहीं .. कोई आज नहीं …वहां तो दार-उल-हर्ब को दार-उल-इस्लाम में बदलने का ही लक्ष्य है पल.. प्रति पल
विभाजन के बाद एक और विभाजन का षड्यंत्र …
आपने बहुत से देशों में से नए देशों का निर्माण देखा होगा, U S S R टूटने के बाद बहुत से नए देश बने, जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान आदि … परन्तु यह सब देश जो बने वो एक परिभाषित अविभाजित सीमा के अंदर बने l
और जब भारत का विभाजन हुआ .. तो क्या कारण थे की पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान बनाए गए… क्यों नही एक ही पाकिस्तान बनाया गया… या तो पश्चिम में बना लेते या फिर पूर्व में l
परन्तु ऐसा नही हुआ …. यहाँ पर उल्लेखनीय है की मोहनदास करमचन्द ने तो यहाँ तक कहा था की पूरा पंजाब पाकिस्तान में जाना चाहिए, बहुत कम लोगों को ज्ञात है की 1947 के समय में पंजाब की सीमा दिल्ली के नजफगढ़ क्षेत्र तक होती थी … यानी की पाकिस्तान का बोर्डर दिल्ली के साथ होना तय था … मोहनदास करमचन्द गाँधी के अनुसार l
नवम्बर 1968 में पंजाब में से दो नये राज्यों का उदय हुआ .. हिमाचल प्रदेश और हरियाणा l
पाकिस्तान जैसा मुस्लिम राष्ट्र पाने के बाद भी जिन्ना और मुस्लिम लीग चैन से नहीं बैठे …
उन्होंने फिर से मांग की … की हमको पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं l
1. पानी के रास्ते बहुत लम्बा सफर हो जाता है क्योंकि श्री लंका के रस्ते से घूम कर जाना पड़ता है l
2. और हवाई जहाज से यात्राएं करने में अभी पाकिस्तान के मुसलमान सक्षम नही हैं l इसलिए …. कुछ मांगें रखी गयीं 1. इसलिए हमको भारत के बीचो बीच एक Corridor बना कर दिया जाए….
2. जो लाहोर से ढाका तक जाता हो … (NH – 1)
3. जो दिल्ली के पास से जाता हो …
4. जिसकी चौड़ाई कम से कम 10 मील की हो … (10 Miles = 16 KM)
5. इस पूरे Corridor में केवल मुस्लिम लोग ही रहेंगे l
30 जनवरी को गांधी वध यदि न होता, तो तत्कालीन परिस्थितियों में बच्चा बच्चा यह जानता था की यदि मोहनदास करमचन्द 3 फरवरी, 1948 को पाकिस्तान पहुँच गया तो इस मांग को भी …मान लिया जायेगा
तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार तो मोहनदास करमचन्द किसी की बात सुनने की स्थिति में था न ही समझने में …और समय भी नहीं था जिसके कारण हुतात्मा नाथूराम गोडसे जी को गांधी वध जैसा अत्यधिक साहसी और शौर्यतापूर्ण निर्णय लेना पडा l
हुतात्मा का अर्थ होता है जिस आत्मा ने अपने प्राणों की आहुति दी हो …. जिसको की वीरगति को प्राप्त होना भी कहा जाता है l
यहाँ यह सार्थक चर्चा का विषय होना चाहिए की हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे जीने क्या एक बार भी नहीं सोचा होगा की वो क्या करने जा रहे हैं ?
किसके लिए ये सब कुछ कर रहे हैं ?
उनके इस निर्णय से उनके घर, परिवार, सम्बन्धियों, उनकी जाती और उनसे जुड़े संगठनो पर क्या असर पड़ेगा ?
घर परिवार का तो जो हुआ सो हुआ …. जाने कितने जघन्य प्रकारों से समस्त परिवार और सम्बन्धियों को प्रताड़ित किया गया l
परन्तु ….. अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले मोहनदास करमचन्द के कुछ अहिंसक आतंकवादियों ने 30 जनवरी, 1948 की रात को ही पुणे में 6000 ब्राह्मणों को चुन चुन कर घर से निकाल निकाल कर जिन्दा जलाया l
10000 से ज्यादा ब्राह्मणों के घर और दुकानें जलाए गए l
सोचने का विषय यह है की उस समय संचार माध्यम इतने उच्च कोटि के नहीं थे, विकसित नही थे … फिर कैसे 3 घंटे के अंदर अंदर इतना सुनियोजित तरीके से इतना बड़ा नरसंहार कर दिया गया ….
सवाल उठता है की … क्या उन अहिंसक आतंकवादियों को पहले से यह ज्ञात था की गांधी वध होने वाला है ?
जस्टिस खोसला जिन्होंने गांधी वध से सम्बन्धित केस की पूरी सुनवाई की… 35 तारीखें पडीं l
अदालत ने निरीक्षण करवाया और पाया हुतात्मा पनदिर नाथूराम गोडसे जी की मानसिक दशा को तत्कालीन चिकित्सकों ने एक दम सामान्य घोषित किया l पंडित जी ने अपना अपराध स्वीकार किया पहली ही सुनवाई में और अगली 34 सुनवाइयों में कुछ नहीं बोले … सबसे आखिरी सुनवाई में पंडित जी ने अपने शब्द कहे “”

Friday, 5 August 2016

केजरीवाल का ध्यान शिविर में भी नाटक।

केजरीवाल का ध्यान शिविर :-

गुरूजी - क्या हुआ पुत्र , तुम आँख बंद करके छटपटा क्यों रहे हो ? चेहरे पर परेशानी क्यों ?

केजरी : गुरूजी ध्यान नहीं लग रहा... मैं इधर आ गया, उधर जीएसटी बिल पास हो गया, मुझे भी इस पर निंदा करनी थी, मैं पीछे रह गया...

गुरूजी : पुत्र , जाकर कर देना, ध्यान लगाओ, साँसों पर ध्यान....

केजरीवाल : अरे पर उधर L G की भी जीत हो गयी, कोर्ट में तो हम किसी मामले पर जीत नहीं रहे, अदालत के फैसले की निंदा करनी थी....

गुरूजी : अभी तुम ये सब राजनीती की बातें निकाल कर लंबी लंबी गहरी सांसें लो....

केजरीवाल : राजनाथ जी जा रहे थे तब भी ताने नहीं मार सका और लौट के आये हैं तब भी कुछ तो नेगेटिव बोलना था, देखिये उधर नितीश ने मजाक उड़ाया , मैं  पीछे रह गया...

गुरूजी : पुत्र, यही नेगेटिविटी तो निकालनी है, ध्यान से संभव हो जायेगा,

केजरीवाल : अरे क्या ध्यान ध्यान ध्यान.... ध्यान गया तेल लेने,  कैसे लगेगा ध्यान ? कालू, संजू,  सिसोदु, सब कहीं लुटिया ना डुबो दें... अगली बार मुझे pm बनना है, दिल्ली के बाद पूरे देश को मुर्ख बनाऊंगा.... यहाँ तो मैं सिर्फ टाइमपास करने आया हूँ, उधर भी वही कर रहा था पर पकड़ में आ जाता था।

गुरूजी : तो कुपुत्र, तू यहाँ क्यों आया था ?

केजरीवाल : सच बताऊँ गुरूजी, जिस तरह से मेरी पार्टी के लोग गिरफ्तार हो रहे थे तो मुझे डरावने सपने आने लगे थे, ऐसा लगता था कि अगली बार कहीं मैं ना गिरफ्तार हो जाऊं।। पत्नी ने कहा... कुछ दिन आप कहीं घूम कर आइये, दिमाग ठीक हो जायेगा, इसलिए....

(फिर केजरीवाल ने आँखें बंद कर ली, पर एक आँख खुली थी)

Thursday, 4 August 2016

संगीत भी ऋषियों की देन है।

संगीत और वाद्ययंत्रों का अविष्कार भारत में ही हुआ है। संगीत का सबसे प्राचीन ग्रंथ सामवेद है। हिन्दू धर्म का नृत्य, कला, योग और संगीत से गहरा नाता रहा है। हिन्दू धर्म मानता है कि ध्वनि और शुद्ध प्रकाश से ही ब्रह्मांड की रचना हुई है। हिन्दुओं के लगभग सभी देवी और देवताओं के पास अपना एक अलग वाद्य यंत्र है। विष्णु के पास शंख है तो शिव के पास डमरू, नारद मुनि और सरस्वती के पास वीणा है, तो भगवान श्रीकृष्ण के पास बांसुरी।

भारतीय ऋषियों ने ऐसी सैकड़ों ध्वनियों को खोजा, जो प्रकृति में पहले से ही विद्यमान है। उन ध्वनियों के आधार पर ही उन्होंने मंत्रों की रचना की, संस्कृत भाषा की रचना की और ध्यान में सहायक ध्यान ध्वनियों की रचना की। इसके अलावा उन्होंने ध्वनि विज्ञान को अच्छे से समझकर इसके माध्यम से शास्‍‍त्रों की रचना की और प्रकृति को संचालित करने वाली ध्वनियों की खोज भी की।

प्राचीन भारतीय संगीत दो रूपों में प्रचलन में था-1. मार्गी और 2. देशी। मार्गी संगीत तो लुप्त हो गया लेकिन देशी संगीत बचा रहा जिसके मुख्यत: दो विभाजन हैं- 1. शास्त्रीय संगीत और 2. लोक संगीत।

शास्त्रीय संगीत शास्त्रों पर आधारित और लोक संगीत काल और स्थान के अनुरूप प्रकृति के स्वच्छंद वातावरण में स्वाभाविक रूप से पलता हुआ विकसित होता रहा। मुस्लिमों के शासनकाल में प्राचीन भारतीय संगीत की समृद्ध परंपरा को अरबी और फारसी में ढालने के लिए आवश्यक और अनावश्यक और रुचि के अनुसार उन्होंने इसमें अनेक परिवर्तन किए। उन्होंने उत्तर भारत की संगीत परंपरा का इस्लामीकरण करने का कार्य किया जिसके चलते नई शैलियां भी प्रचलन में आईं, जैसे खयाल व गजल आदि। बाद में सूफी आंदोलन ने भी भारतीय संगीत पर अपना प्रभाव जमाया। आगे चलकर देश के विभिन्न हिस्सों में कई नई पद्धतियों व घरानों का जन्म हुआ। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान पाश्चात्य संगीत से भी भारतीय संगीत का परिचय हुआ।

मुस्लिम काल में नए वाद्य यंत्रों की भी रचना हुई, जैसे सरोद और सितार। दरअसल, ये वीणा के ही बदले हुए रूप हैं। इस तरह वीणा, बीन, मृदंग, ढोल, डमरू, घंटी, ताल, चांड, घटम्, पुंगी, डंका, तबला, शहनाई, सितार, सरोद, पखावज, संतूर आदि का आविष्कार भारत में ही हुआ है। भारत की आदिवासी जातियों के पास विचित्र प्रकार के वाद्य यंत्र मिल जाएंगे जिनसे निकलने वाली ध्वनियों को सुनकर आपके दिलोदिमाग में मदहोशी छा जाएगी।

Wednesday, 3 August 2016

दोस्तों मेरी शादी हो गयी।

मैं शायद पहला ऐसा लड़का था जिसने शादी के पहले होने वाली संगिनी की तस्वीर तक नहीं देखी थी, ना मैं ये जानता था कि वो कितनी पढ़ी लिखी है, या क्या उम्र है, कुछ भी नहीं ? बस माँ की इच्छा पूरी करने हेतु कह दिया था, ठीक है जिससे चाहती हो मेरी शादी करवा दो। इसके पहले कई राउंड इमोशनल ब्लैकमेलिंग के फ़िल्मी सीन घर में हो चुके थे। घर में ऐसा माहौल बना हुआ था कि अगर मेरी शादी नहीं हुई तो पूरा परिवार तबाह हो जायेगा, महंगाई बढ़ जायेगी, बाढ़ का पानी इधर आ जायेगा, भूकम्प इस घर के नीचे जरूर आयेगा, सारी लडकियां कुंवारी रह जायेगी, माँ तो तभी हंसेंगी जब बहु आ जायेगी, परिवार के लोग तभी अच्छे से बात करेंगे जब वो मुझे शादीशुदा देख लेंगे। समस्या बहुत विकट हो चली थी।

बाजार का हाल बहुत बुरा था, जितने दोस्त मिलते वो पहले नमस्ते के बाद यही कहते ..."और शादी वादी हो गयी ?"
मेरी समझ में नहीं आता क्या कहूँ ? जब सच बोलता तो बहुत बुरा मुंह बना कर 'रायचंद' बन जाते, और कहते...
"अरे भैया , कर लो, बुढ़ापे में कौन देखेगा, तेरी माँ को कौन देखेगा, कभी बीमार पड़ गए तो क्या होगा, ऐसा नहीं चलता जिंदगी यार, ये तू क्या कर रहा है दोस्त......"

हालात ऐसे थे कि दोस्तों के घर जाना मिलना छोड़ दिया था, सभी मेरे ऊपर हावी हो गए थे, और माँ.... की कहानी...
मेरे जितने दोस्त हैं सबको माँ मेरे पीछे चुपके से मिलती और कहती...कैसा दोस्त है आपलोग, समझाते नहीं इसको, समझाइये ना,

फिर मेरे परिवार के जितने लोग है, मौसा मौसी चाचा चाही मामा मामी भैया भाभी फूफा फूफी ..... सबको घर तक बुला कर लाती और (लाने के पहले योजना समझा देती) सब मुझे घर में बस यही समझाने का प्रयास करते,
पहले किराए के मकान में था, गाँव में वहाँ के मकान मालिक, आस पड़ोस वाले सब मुझे समझाने आते, इस बात की इन्तिहाँ भी हुयी जब मुम्बई में दो दिन के लिए आई तो, मेरे रूम पार्टनर को मेरे पीछे में विनती करके गयी कि आप साथ रहते हो इसको समझाओ, बाप रे बाप।

हालात इतने ख़राब थे, किसी को सिर्फ बातों से , भावनाओ से इस प्रकार घेरा जा सकता है ये पहली बार जिंदगी में अनुभव हुआ, दिन रात बस यही एक सोच,लेकिन मैं अड़ा हुआ था...

पर मैं उस वक़्त टूट जाय करता था जब माँ रोने लगती, उसका रोना सुन मकान मालिक, बाकी लोग घर में आ जाते तब मैं खुद को दुनिया का सबसे गिरा हुआ आदमी समझता, पापी समझता, फिर एक दोस्त ने कहा, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम अपनी जिंदगी माँ के नाम कर दो, ऐसी भावना से शादी कर लो। बस एक दिन हाँ कर दिया मैंने और कहा, जिससे करनी हो शादी कर दो।

कमाल है सिर्फ एक हफ्ते में सब ठीक हो गया, महीने भर के अंदर बारात भेज दी, जैसे आधा काम करके रखी हो, जैसे उसे पता था कि वो मुझे तैयार कर ही लेगी। खैर, शादी के समय पहली बार मुझे लगा कि जोकर वाली हालात होती है लड़के की। गुलाम हो जाता है दो तीन दिन के लिए। जो जैसा कहता , करना पड़ता है। अब ये पहन लो, अब वो पहन लो, दाएं चलो, बाएं घूमो, बैठ जाओ, खड़े हो जाओ, नहीं बस आज फल ही खाना है। शादी के दो दिन तो लगा मैं खुद से अपना हाथ भी नहीं हिला सकता जब वो कहेंगे पास में मौजूद लोग तभी कुछ होगा।

शादी करने कहीं सुदूर क्षेत्र में गया था, बिलकुल गाँव की लेकिन हिन्दू संस्कारों वाली लड़की तो अब इधर ही मिलती है, मिली। पहली बार उसका चेहरा वरमाला में ही देखा। चूँकि शादी मर्जी से थी नहीं, तो शादी के बाद बात करने का दिल नहीं था पर एक दिन देखा मेरे इस व्यवहार से वो दुखी थी, फिर उसके चेहरे को देखते हुए मैंने सोचा, इसमें इसकी क्या गलती है ? ? फिर मैंने खुद को ही दोष दिया और बातें की।

शादी में मैंने शर्त रख दी थी कि मैं कुछ भी नहीं लूंगा। एक रुपये भी जिसे दहेज़ कहते हैं नहीं लिया, ना कोई टीवी, फ्रिज, बाइक, पलंग, कुर्सी, बर्तन कुछ भी नहीं, यहाँन तक कि शादी के पहले उसके पिताजी और चाचा आये थे कि लड़के को बाजार लेजाकर उसके लिए कपडे जूते आज खरीदने हैं तो मैं घर से भाग गया, मैंने फोन करके कहा, मुझे कुछ नहीं चाहिए मैं अपने पैसे से ख़रीदे कपडे जूते पहनूंगा, सभी हैरान परेशान शाम तक इंतज़ार के बाद लौट गए। लड़की कितनी पढ़ी है या नहीं पढ़ी है इस बात को कहना ठीक नहीं, उसका व्यवहार अच्छा है, बस इससे ज्यादा ठीक नहीं।

बस इतनी सी है कहानी। माँ खुश तो मैं खुश। हाँ शादी के बाद वो कहती है कि शायद मैं दुनिया की सबसे लकी लड़की हूँ, ऐसा तो मैंने सपने में सोचा था, अब ये तारीफ़ सुनकर मुझे भी अच्छा ही लगेगा ना । ☺

Tuesday, 2 August 2016

ये समय आपके GABBAR बनने का है।

कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है, कि अपनी बेटी के रेपिस्टों को सजा देने के लिए क्या एक पिता हथियार नहीं उठा सकता ? क्यों ना चला जाए उस हाइवे सहित सभी हाइवे पर... जहां नेताओ और पुलिस के द्वारा संरक्षित ये गुंडे हमारे जीवन को बर्बाद करने की ताक में बैठे रहते हैं ? क्यों लगाते हैं गुहार उस गुनाहगार मुख्यमंत्री से दूसरे गुनाहगार को सजा देने के लिए ?
"गब्बर इज बैक" आज की इसी मजबूर हालात के लिए एक रास्ता दिखाने वाली फिल्म थी। कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं होती, पर क्या ये नियम सिर्फ आम लोगों के लिए है ? ?

जिस दिन कानून साथ ना दे, नेता पुलिस जज सब गुनाहगार के पक्ष में खड़े हो जाएं तो किसी को तो गब्बर बनना ही पड़ेगा। आपको खुद निकलना पड़ेगा, अपनी तार तार हो चुकी जिंदगी को सम्मान देने के लिए। जिंदगी दांव पर लगाना पड़ेगा। अपमान की जिंदगी से मिलेगा भी क्या ? कैसे आप उस पत्नी और बेटी से आँख मिला कर जिन्दा रहेंगे ?

जिस सड़क पर ना जाने कितनी माँ बहनों की जिंदगी बर्बाद हुई है। सभी के घरों में एक आदमी जरूर होगा, जिसे नींद नहीं आती होगी, प्रतिशोध की आग में जल रहा होगा, उन लोगों को खोजिये, एक छोटी सी टीम बनाइये, और चुन चुन कर  मारिये।

उसकी लाश के पास एक सन्देश लिखा होगा.....

"सरकार के फेल होने की वजह से इस अपराधी को हम मार रहे है।"

मुझे पूरा विश्वास है गब्बर बने इन लोगों को पूरे देश के आम लोगों का समर्थन मिलेगा और इसमें  मेरा समर्थन हर तरीके से होगा।