Monday, 12 September 2016

मीना बाजार शुरू हुआ था अकबर के काम वासना के लिए

मीना बाजार लगभग सभी लोग जाते होंगे पर इसका इतिहास जरूर जानना चाहिए। भारत के ज्ञात इतिहास में कामुक वृत्ति के दो चरित्र मिलते हैं। एक मांडव का गयासुद्दीन और दूसरा अकबर। इनमें भी अकबर ने गयासुद्दीन को बहुत पीछे छोड़ दिया। गयासुद्दीन के पथ पर आज भी सभी मुस्लिम चलते हैं यानी सिर्फ हिन्दू लड़कियों को शिकार बनाओ मुस्लिम को नहीं। लेकिन, अकबर ने तो मानवता की सारी मर्यादाएं तोड़ दी थीं। क्या शत्रु, क्या मित्र, क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, क्या प्रजा, क्या दरबारी, किसी की सुंदर बहन-बेटी इस 'कामी कीड़े' की वासना से नहीं बच पाई थी।

मुस्लिम प्रजा के साथ-साथ हिन्दुओं ने भी परदा प्रथा को अपना लिया था। इस कारण बुरके और घूंघट में छिपी सुंदर स्त्रियों को ढूंढ निकालना आसान नहीं था। दरबारियों के जनानखाने सुंदर हिन्दू, मुसलमान महिलाओं से भरे पड़े थे। दरबारियों की कन्याएं भी जवान हो रही थीं, किंतु परदे की ओट में थीं। धूर्त अकबर ने अपने दरबारियों और प्रजा की सुंदर महिलाओं को खोजने का एक आसान उपाय निकाला। उसने राजधानी में मीना बाजार लगाने की परंपरा डाली।

अकबर का मीना बाजार : आगरे के किले के सामने मैदान में मीना बाजार लगना प्रारंभ हुआ। शुक्रवार को पुरुष वर्ग तो पांच बार की नमाज में व्यस्त रहता था। इस दिन किले में और किले के आसपास पुरुषों का प्रवेश वर्जित था। सारे मैदान में महिलाएं दुकान सजाकर बैठती थीं और महिलाएं ही ग्राहक बनकर आ सकती थीं।

अकबर का आदेश था कि प्रत्येक दरबारी अपनी महिलाओं को दुकान लगाने के लिए भेजे। नगर के प्रत्येक दुकानदार को भी हुक्म था कि उनके परिवार की महिलाएं उनकी वस्तुओं की दुकान लगाएं। इस आदेश में चूक क्षम्य नहीं थीं। किसी सेठ और दरबारी की मीना बाजार में दुकान का न लगाना अकबर का कोपभाजन बनना था।

धीरे-धीरे मीना बाजार जमने लगा। निर्भय बेपरदा महिलाएं खरीद-फरोख्त को घूमने लगीं। अकबर की कूटनियां और स्वयं अकबर स्त्री वेश में मीना बाजार में घूमने लगे। प्रति सप्ताह किसी सेठ या दरबारी की सुंदर महिला पर गाज गिरती। वह अकबर की नजरों में चढ़ जाती अकबर की कूटनियां किसी भी प्रकार उसे किले में पहुंचा देतीं।
कुछ तो लोकलाज का भय, कुछ पति के प्राणों का मोह, लुटी-पिटी महिलाओं का मुंह बंद कर देता। साथ ही अन्य महिलाओं द्वारा यदि पुरुषों तक बात पहुंचती भी तो मौत के डर से मन-मसोसकर रह जाते। अस्मतें लुटती रही और मीना बाजार चलता रहा।

कभी-कभी कोई अत्यंत सुंदर स्त्री अकबर को भा जाती और वह उसके घर वालों के संदेश भिजवा देता कि डोला हरम में भिजवा दें। यदि स्त्री विवाहित हुई तो उसके पति को तलाक के लिए बाध्य करता। इस प्रकार कई दरबारियों की कन्याएं और विवाहिताएं आगरे के किले में लाई गईं। उच्च वंश के शाह अबुल माली और मिर्जा शर्फुद्दीन हुसैन जैसे लोगों की महिलाएं भी अकबर की वासना की शिकार बनी थीं। इन्हीं दिनों एक शेख की पत्नी अकबर की निगाह में चढ़ गई। अकबर ने शेख पर दबाव डाला कि अपनी पत्नी को तलाक दे दे ताकि मैं उसे अपने हरम में डाल सकूं। न तो शेख अपनी पत्नी को छोड़ना चाहता था, न उसकी पत्नी ही इस पशु के पास जाना चाहती थी।

आगरा के और भी 10-12 परिवारों की महिलाओं को अकबर अपने हरम में डालना चाहता था। आखिर आगरा के चुनिंदा मुसलमान दर‍बारियों की एक गुप्त बैठक हुई जिसमें अकबर की हत्या की योजना बनाई गई। शर्फुद्दीन का एक हिन्दू गुलाम था फुलाद, बाड़मेर का रहने वाला, ऊंचा-पूरा, कद्दावर जवान आबूमाली के मित्र शर्फुद्दीन ने उसे अपनी गुलामी से मुक्त किया और बदले में अकबर को मार डालने का वचन लिया।

सदा अंगरक्षकों से घिरे रहने वाले अकबर को तलवार या भाले से मारना संभव नहीं था। बंदूकें उस समय बारूद की एक नाल या दो नाल की हुआ करती थीं, जिनसे एक या दो बार ही फायर किया जा सकता था। तब निर्णय हुआ कि तीर से अकबर को मारा जाए। तीर भी अधिक दूरी से मारना था, इस कारण मजबूत कमान की जरूरत पड़ी ताकि तीर शरीर के भीतर तक पैठ सकें। फुलाद ने तीरंदाजी के अभ्यास में कई धनुष तोड़ डाले, फिर एक लोहे का बना कन्धहारी धनुष उसे दिया गया, लोहे के धनुष से अभ्यास के बाद घातक दल अवसर की ताक में रहने लगा।

आगरा में तो काम बना नहीं। पता लगा जनवरी 1564 में अकबर शेख निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर जियारत के लिए जाना चाहता है। घातक दल के लोग जनवरी के प्रथम सप्ताह में दिल्ली पहुंच गए और उपयुक्त स्थान की तलाश कर घात लगाकर बैठ गए। औलिया की दरगाह के मार्ग में माहम अनगा द्वारा निर्मित एक दुमंजिला मदरसा भी था। इसी मदरसे की छत पर फुलाद तीरों का तरकश लेकर जा बैठा। माहम अनगा के पु‍त्र आदम खां को किले की दीवार से गिराकर अकबर ने मरवाया था और पुत्र के गम में कुछ दिन बाद अनगा भी मर गई थी। अनगा का परिवार भी अकबर के खून का प्यासा था और हत्या-योजना में शामिल था।

11 जनवरी 1564 को अकबर ने औलिया की दरगाह पर जा दर्शन किए। अकबर दरगाह से लौट रहा था। उसके अंगरक्षक बिखरे हुए थे। कुछ तो साथ थे कुछ आगे बढ़ गए थे और कुछ दरगाह में प्रार्थना के लिए रुके थे। अकबर जैसे ही मदरसे के नीचे आया, एक सनसनाता तीर आकर उसका कंधा बिंध गया। अकबर जोर से चीख पड़ा। अंगरक्षकों ने उसे अपनी ढालों की ओट में ले लिया और तीर की दिशा में निगाहें दौड़ाईं। देखा तो मदरसे की छत से ए‍क विशालकाल व्यक्ति तीर बरसा रहा है। सन्नाते तीर अंगरक्षकों की ढालों से टकरा रहे थे। लोग मदरसे की ओर तलवारें सूंत दौड़ पड़े। फुलाद के शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए।

अंगरक्षक घुड़सवारों ने अकबर की सवारी के मार्ग में आने वाले सभी बाजार बंद करवा दिए। प्रत्येक घर के खिड़की-दरवाजे बंद करवा दिए गए। घरों की छतों पर मुगल निशानेबाज बैठा दिए गए। इस प्रकार पूर्ण सुरक्षा के साथ अकबर दिल्ली के महल में लाया गया। तीर काफी भीतर तक धंस गया था और लगातार खून बह रहा था। कुशल जर्राहों (सर्जन) ने कंधे से तीर निकला। दस दिन तक हकीमों से इलाज करवा अकबर पालकी में बैठ आगरा लौटा। गहरे घाव के कारण वह घोड़े की सवारी के अयोग्य था और हाथी की सवारी में निशानेबाजों का खतरा था। (स्मिथ पृष्ठ 61)

मौत के भय ने अकबर को झकझोर दिया था। उसने बलात लोगों की पत्नियां छीनना तो बंद कर दिया, लेकिन मीना बाजार चलता रहा और महिलाओं की आबरू लुटती रही। फर्क इतना था कि औरतें हमेशा के लिए हरम में रोकी नहीं जाती थीं। एकआध दिन या कुछ घंटों के बाद छोड़ दी जाती थीं।

महाराणा की भतीजी जब आयी मीना बाजार में तो अकबर की छाती पर चढ़ बैठी, इसकी कहानी लगभग सबने पढ़ी ही है।

Thursday, 8 September 2016

भारत के सरस्वती नदी के साथ जुड़ा रहस्य

हिन्दू धर्म के 90 हजार से भी ज्यादा वर्षों के लिखित इतिहास में लगभग 20 हजार वर्ष पूर्व नए सिरे से वैदिक धर्म की स्थापना हुई और नए सिरे से सभ्यता का विकास हुआ। प्रारंभ में ब्रह्मा और उनके पुत्रों ने धरती पर विज्ञान, धर्म, संस्कृति और सभ्यता का विस्तार किया। इस दौर में शिव और विष्णु सत्ता, धर्म और इतिहास के केंद्र में होते थे। देवता और असुरों का काल अनुमानित 20 हजार ईसा पूर्व से लगभग 7 हजार ईसा पूर्व तक चला। फिर धरती के जल में डूब जाने के बाद ययाति और वैवस्वत मनु के काल और कुल की शुरुआत हुई।

पहली बात तो यह जानना जरूरी है कि उत्तर भारत और दक्षिण भारत में भिन्न-भिन्न सभ्यताएं नहीं थी बल्कि एक ही सभ्यता के दो रूप थे। आर्य कोई जाती नहीं और ना वे कहीं बाहर से आए थे। सभी भारतीय द्रविड़ है। स्थान विशेष और वातावरण के लंबे काल के चलते रंग और रूप में थोड़ा बहुत अंतर है।

हिमालय से निकलकर सिन्धु और सरस्वती नदी अरब के समुद्र में गिर जाती है। इतिहासकार मानते हैं कि 1700 से 1800 ईसा पूर्व सरस्वती नदी लुप्त हो गई और सिंधु ने अपनी दिशा बदल दी। अधिकतर इतिहासकार भारत के इतिहास की पुख्ता शुरुआत सिंधु नदी की घाटी की मोहनजोदड़ो और हड़प्पाकालीन सभ्यता से मानते थे लेकिन अब जबसे सरस्वती नदी की खोज हुई है, भारत का इतिहास बदलने लगा है। अब माना जाता है कि यह सिंधु घाटी की सभ्यता से भी कई हजार वर्ष पुरानी है।

एक फ्रेंच प्रोटो-हिस्टोरियन माइकल डैनिनो ने नदी की उत्पत्ति और इसके लुप्त होने के संभावित कारणों की खोज की है। वे कहते हैं कि ऋग्वेद के मंडल 7वें के अनुसार एक समय पर सरस्वती बहुत बड़ी नदी थी, जो कि पहाड़ों से बहकर नीचे आती थी। अपने शोध 'द लॉस्ट रिवर' में डैनिनो कहते हैं कि उन्हें बरसाती नदी घग्घर नदी का पता चला। कई स्थानों पर यह एक बहुत छोटी-सी धारा है लेकिन जब मानसून का मौसम आता है, तो इसके किनारे 3 से 10 किलोमीटर तक चौड़े हो जाते हैं। इसके बारे में माना जाता है कि यह कभी एक बहुत बड़ी नदी रही होगी। यह भारत-तिब्बत की पहाड़ी सीमा से निकली है।
उन्होंने बहुत से स्रोतों से जानकारी हासिल की और नदी के मूल मार्ग का पता लगाया। ऋग्वेद में भौगोलिक क्रम के अनुसार यह नदी यमुना और सतलुज के बीच रही है और यह पूर्व से पश्चिम की तरह बहती रही है। नदी का तल पूर्व हड़प्पाकालीन था और यह 4 हजार ईसा पूर्व के मध्य में सूखने लगी थी।

इसरो के वैज्ञानिक एके गुप्ता का कहना है कि थार के रेगिस्तान में पानी का कोई स्रोत नहीं है लेकिन यहां कुछ स्थानों पर ताजे पानी के स्रोत मिले हैं। जैसलमेर जिले में जहां बहुत कम बरसात होती है (जो कि 150 मिमी से भी कम है), यहां 50-60 मीटर पर भूजल मौजूद है। इस इलाके में कुएं सालभर नहीं सूखते हैं। इस पानी के नमूनों में ट्राइटियम की मात्रा नगण्य है जिसका मतलब है कि यहां आधुनिक तरीके से रिचार्ज नहीं किया गया है। स्वतंत्र तौर पर आइसोटोप विश्लेषण से भी इस तथ्य की पुष्टि हुई है कि रेत के टीलों के नीचे ताजा पानी जमा है और रेडियो कार्बन डाटा इस बात का संकेत देते हैं कि यहां कुछेक हजार वर्ष पुराना भूजल मौजूद है। आश्चर्य की बात नहीं है कि ताजे पानी के ये भंडार सूखी तल वाली सरस्वती के ऊपर हो सकते हैं।

Monday, 5 September 2016

गुरु, आचार्य, पुजारी, ब्राह्मण, पंडित एक नहीं होते।

अक्सर लोग पुजारी को पंडितजी या पुरोहित को आचार्य भी कह देते हैं और सुनने वाले भी उन्हें सही ज्ञान नहीं दे पाता है। यह विशेष पदों के नाम हैं जिनका किसी जाति विशेष से कोई संबंध नहीं। गुरु, आचार्य, पुरोहित, पंडित, ब्राह्मण आदि सब अलग अलग पद है।

गुरु : गु का अर्थ अंधकार और रु का अर्थ प्रकाश। अर्थात जो व्यक्ति आपको अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए वह गुरु होता है। गुरु का अर्थ अंधकार का नाश करने वाला। अध्यात्मशास्त्र अथवा धार्मिक विषयों पर प्रवचन देने वाले व्यक्तियों में और गुरु में बहुत अंतर होता है। गुरु आत्म विकास और परमात्मा की बात करता है। प्रत्येक गुरु संत होते ही हैं; परंतु प्रत्येक संत का गुरु होना आवश्यक नहीं है। केवल कुछ संतों में ही गुरु बनने की पात्रता होती है। गुरु का अर्थ ब्रह्म ज्ञान का मार्गदर्शक।

आचार्य : आचार्य उसे कहते हैं जिसे वेदों और शास्त्रों का ज्ञान हो और जो गुरुकुल में ‍विद्यार्थियों को शिक्षा देने का कार्य करता हो। आचार्य का अर्थ यह कि जो आचार, नियमों और सिद्धातों आदि का अच्छा ज्ञाता हो और दूसरों को उसकी शिक्षा देता हो। वह जो कर्मकाण्ड का अच्छा ज्ञाता हो और यज्ञों आदि में मुख्य पुरोहित का काम करता हो उसे भी आचार्य कहा जाता था। आजकल आचार्य किसी महाविद्यालय के प्रधान अधिकारी और अध्यापक को कहा जाता है।

पुरोहित : पुरोहित दो शब्दों से बना है:- 'पर' तथा 'हित', अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। प्राचीन काल में आश्रम प्रमुख को पुरोहित कहते थे जहां शिक्षा दी जाती थी। हालांकि यज्ञ कर्म करने वाले मुख्‍य व्यक्ति को भी पुरोहित कहा जाता था। यह पुरोहित सभी तरह के संस्कार कराने के लिए भी नियुक्त होता है। प्रचीनकाल में किसी राजघराने से भी पुरोहित संबंधित होते थे। अर्थात राज दरबार में पुरोहित नियुक्त होते थे, जो धर्म-कर्म का कार्य देखने के साथ ही सलाहकार समीति में शामिल  रहते थे।

पुजारी : पूजा और पाठ से संबंधित इस शब्द का अर्थ स्वत: ही प्रकाट होता है। अर्थात जो मंदिर या अन्य किसी स्थान पर पूजा पाठ करता हो वह पुजारी। किसी देवी-देवता की मूर्ति या प्रतिमा की पूजा करने वाले व्यक्ति को पुजारी कहा जाता है।

पंडित : पंडः का अर्थ होता है विद्वता। किसी विशेष ज्ञान में पारंगत होने को ही पांडित्य कहते हैं। पंडित का अर्थ होता है किसी ज्ञान विशेष में दश या कुशल। इसे विद्वान या निपुण भी कह सकते हैं। किसी विशेष विद्या का ज्ञान रखने वाला ही पंडित होता है। प्राचीन भारत में, वेद शास्त्रों आदि के बहुत बड़े ज्ञाता को पंडित कहा जाता था। इस पंडित को ही पाण्डेय, पाण्डे, पण्ड्या कहते हैं। आजकल यह नाम ब्रह्मणों का उपनाम भी बन गया है। कश्मीर के ब्राह्मणों को तो कश्मीरी पंडितों के नाम से ही जाना जाता है। पंडित की पत्नी को देशी भाषा में पंडिताइन कहने का चलन है।

ब्राह्मण : ब्राह्मण शब्द ब्रह्म से बना है। जो ब्रह्म (ईश्वर) को छोड़कर अन्य किसी को नहीं पूजता, वह ब्राह्मण कहा गया है। जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है। जो ज्योतिषी या नक्षत्र विद्या से अपनी जीविका चलाता है वह ब्राह्मण नहीं, ज्योतिषी है। पंडित तो किसी विषय के विशेषज्ञ को कहते हैं और जो कथा बांचता है वह ब्राह्मण नहीं कथावाचक है। इस तरह वेद और ब्रह्म को छोड़कर जो कुछ भी कर्म करता है वह ब्राह्मण नहीं है। जिसके मुख से ब्रह्म शब्द का उच्चारण नहीं होता रहता, वह ब्राह्मण नहीं।

स्मृति पुराणों में ब्राह्मण के 8 भेदों का वर्णन मिलता है- मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि।
ब्राह्मण को धर्मज्ञ विप्र और द्विज भी कहा जाता है जिसका किसी जाति या समाज से कोई संबंध नहीं।

इस्लामोगुल्ला कड़वा है पर खाना पड़ेगा

अब्दुल आया... उसके हाथ में एक मिठाई का डब्बा था ... उसने आते ही कहा..
ये लो मिठाई खाओ.. ये पुरे विश्व में बहुत प्रसिद्द है ... बहुत ही मीठी है.. लो तुम्हे भी यह मिठाई खाने को दावत दे रहा हूँ....

अच्छा पर इसका नाम क्या है ?

इस्लामुगुल्ला...

अच्छा लाओ..

(मैंने खाया ... तो एकदम मिर्ची भरा था कसैला... तीखा... दुर्गन्धित....)

अबे यार ये तो बहुत गन्दा है तीखा है...

नहीं नहीं ये बहुत मीठा है .. हमारे किताब में लिखा है ...

अबे किताब में लिखा है वो तो ठीक है पर सामने दिखना भी तो चाहिए इसका स्वाद...

तुम समझे नहीं अगर हमारे किताब में लिखा है कि ये दुनिया का सबसे अच्छा मिठाई है तो बस है और तुम्हे भी मानना पड़ेगा कि अच्छा है ..

अरे अब्दुल जो चीज़ अच्छी होगी उसके बारे में तो दुनिया कहेगी की अच्छी है मुझे पता चला है कि इस मिठाई को जिस जिस ने खाया वो पागल कुत्ते की तरह दूसरों को खिलाता है और खाने से मना करने वाले को मार देता है ... 

तुम समझे नहीं हमारे किताब में लिखा है की तीखा होने के बाद भी इसको मीठा कहने वाला जन्नत जाएगा...तभी तो इतने लोग इसको खा रहे हैं...

अबे वो तो सूअर भी दिनरात मैला खाते हैं तो क्या मैं सुवर बन जाऊ? अच्छा होता तो मैं खुद मांग कर.... खरीद कर खाता...ना....

लाहौल बिला कुवत तुमने इस मिठाई को मैला कहा.. किताब में लिखा है जो इसको ख़राब कहे उसको मार डालो .. अब मैं तुम्हे मारने जा रहा रहा हूँ...

अच्छा पर तुमने देखा नहीं .. तुम जिस जगह खड़े हो वहीँ तुम्हारे पैर के नीचे बम लगा है .. तुमने पैर हटाया की बम फटा ...

अबे ये ... ये...

हाँ मैं वो हिन्दू हूँ जो तेरी असलियत जानता था इसलिए पहले से सब तैयारी रखी थी...

कोई बात नहीं अब तो काफिर के हाथों मरने के बाद मेरा जन्नत पक्का हो गया है ... या अली ... 72 हूर जिंदाबाद...
(और अब्दुल भाई वहीँ कूद कर फट गए)

कश्मीर के खंडहर बन चुके मंदिरों की कहानी

कश्मीरी पंड़ितों के घाटी से पलायन से पहले वहां उनके 430 मंदिर थे। अब इनमें से मात्र 260 सुरक्षित बचे हैं जिनमें से 170 मंदिर क्षतिग्रस्त है।
1.ज्वालादेवी मंदिर : जम्मू और कश्मीर के कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के पुलवामा से करीब 17 किलोमीटर दूर खरेव में माता ज्वालादेवी का मंदिर है। दो वर्ष पहले कट्टरपंथियों ने इस मंदिर में आग लगागर इसे नष्ट कर दिया। अब यह खंडर ही है।

2.खीर भवानी मंदिर : जम्मू और कश्मीर के मध्य कश्मीर के गंदेरबल जिले के तुल्ला मुल्ला गांव में स्थित यह मंदिर कश्मीरी पंडितों की आराध्य रंगन्या देवी का मंदिर है। यहां वार्षिक खीर भवानी महोत्सव मनाया जाता है, लेकिन आतंकवाद के चलते अब यह बंद है। सतयुग में भगवान श्री राम ने अपने निर्वासन के समय इस मंदिर का इस्तेमाल पूजा के स्थान के रूप में किया था।

3.सूर्य मंदिर : कश्मीर के मार्तंड स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर लगभग 1400 पुराना है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा अशोक के बेटे जलुका ने 200 बीसी में करवाया था जबकि मंदिर के भीतर जो वर्तमान ढांचा है उसका निर्माण किसी अज्ञात हिन्दू श्रद्धालु ने जहांगीर के शासनकाल के दौरान करवाया था। सूर्य की पहली किरण निकलने पर राजा अपनी दिनचर्या की शुरुआत सूर्य मंदिर में पूजा कर चारों दिशाओं में देवताओं का आह्वान करने के बाद करते थे। वर्तमान में खंडहर की शक्ल अख्तियार कर चुके इस मंदिर की ऊंचाई भी अब 20 फुट ही रह गई है।

4.भवानी मंदिर : भारतीय राज्य जम्मू और कश्मीर के कश्मीर में जिला अनंतनाग के लकडिपोरा गांव में स्थित यह भवानी मंदिर की देखरेख अब स्थानीय मुसलमान करते हैं। साल 1990 में कश्मीर में हिंसक आंदोलन शुरू हुआ तो कश्मीर घाटी में रहने वाले लाखों पंडितों को अपने घर-बार छोड़कर जाना पड़ा था। इस गांव से भी हिन्दू पलायन कर गए तो यह मंदिर सूना हो गया।

5.शीतलेश्वर मंदिर : श्रीनगर के हब्बा कदल इलाके में 2000 साल पुराना शीतलेश्वर मंदिर है। लगातार हिंसा के चलते अब यह विरान पड़ा है। हालांकि समय समय पर यहां कश्मीरी पंडित जाते रहते हैं।

6.शंकराचार्य मंदिर : आदि शंकराचार्य ने देश भर में भ्रमण करके ऐसा स्थानों की खोज की जो प्राचीन भारत के गौरवपूर्ण स्थान थे। ऐसे ही प्राचीन महत्वपूर्ण देवस्थलों में शामिल है श्रीनगर का यह प्राचीनतम शिव मंदिर जिसे ज्येष्टेश्वर मंदिर कहा जाता है। अब हालात ये है कि वर्तमान में इसे तख्‍त-ए- सुलेमान नाम के मुस्लिम नाम से पुकारा जाने लगा है। इस मंदिर का निर्माण राजा संदीमान ने कराया था। उस समय यहां 300 स्वर्ण-रजत प्रतिमाएं थीं। सन् 426 से 365 ईसापूर्व कश्मीर पर गोपादित्या का शासन था।

7.त्रिपुरसुंदरी मंदिर : दक्षिण कश्मीर के देवसर इलाके में त्रिपुरसुंदरी मंदिर को कट्टरपंथियों ने तोड़ दिया। यह मंदिर घाटी के कुलगाम जिले के देवसर क्षेत्र में है।

8.रघुनाथ मंदिर:- जम्मू और कश्मीर के जम्मू में रघुनाथ मंदिर को महाराजा गुलाब सिंह ने 1835 में बनवाया था और बाद में उनके पुत्र महाराजा रणवीरसिंह ने 1860 में इसे पूरा करवाया था। इस मंदिर की आंतरिक सज्जा में सोने की पत्तियों तथा चद्दरों का प्रयोग किया गया है। इस मंदिर में देवी-देवताओं की कलात्मक मूर्तियां दर्शनीय हैं।

9.रणवीरेश्वर मंदिर : जम्मू और कश्मीर के जम्मू में प्रसिद्ध मंदिर ‘रणवीरेश्वर मंदिर’ है जिसकी ऊंचाई के आगे सारी इमारतें छोटी दिखाई पड़ती हैं। महाराजा रणवीर सिंह द्वारा 1883 में बनाया गया यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है तथा पत्थर की पट्टी पर बने प्रहत शिवलिंगों के कारण प्रसिद्ध है। 

 10.पीर खो : शहर से 3.5 किमी की दूरी पर सर्कुलर रोड पर स्थित यह स्थान एक प्राकृतिक शिवलिंग के कारण प्रसिद्ध है जिसके इतिहास की जानकारी आज भी नहीं मिल पाई है लेकिन लोककथा यह है कि इस लिंगम के सामने स्थित गुफा देश के बाहर किसी अन्य स्थान पर निकलती है। 

 11.सुद्धमहादेव : जम्मू से 120 किमी की दूरी पर स्थित 1225 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह मनोहारी दृश्यों वाला स्थल प्रत्येक पर्यटक तथा तीर्थयात्री को आकर्षित करता है, क्योंकि भगवान शिव-पार्वती के जीवन से जुड़ी कई कथाओं का यह प्रमुख स्थल रहा है। रहने के लिए स्थान तथा सीधी बस सेवा भी उपलब्ध है। 

 *लद्दाख के मठ : यदि हम लद्दाख की बात करें तो यहां बौद्ध मंदिर और मठ ही हैं। लद्दाख में लेह महल, लेह महल के पास ही स्थित यह गोम्पा भगवान बुद्ध की डबल स्टोरी मूर्ति के लिए जाना जाता है जिसमें भगवान बुद्ध को बैठी हुई मुद्रा में दिखाया गया है। यह भी शाही मठ है।

"खान" टाइटल वाले लोग हैं गैर मुस्लिम

आप में से अधिकांश लोग चौंक जाएँगे ये सुनकर की ‘खान’ शब्द का टाइटल अमुस्लिम (Non Muslim) है! ‘खान’ यह तुर्क-मंगोल नाम इस्लाम पूर्व से ही प्रचलित है . आज भी मंगोलिया (भारत में उसे ‘मुघलिया’ के भ्रष्ट नाम से जानते है) एक बुद्ध धर्म को मानने वाला राष्ट्र है . यहा पर कोई भी मुस्लिम नही है . आज भी चीन, जापान, कोरिया और मंगोलिया में खान नाम पाया जाता है . चीन का एक मंगोल राजा, जिसका नाम कुबलाई खान था, वो जो बुद्ध और वेदिक धर्म का अनुयायी था . कुबलाई खान के एक शिला लेख में ‘ओम नमो भगवते’ घोष के अक्षर पाए गए है . चेंगिज खान भी एक ऐसा वीर योद्धा था, जिसने इस्लाम को लगभग समाप्त कर दिया था .

चेंगिज खान और उसकी मंगोल सेना (मुघल सेना) ऐसे अमुस्लिम थे, जिन्होंने पहली बार मुस्लिम भूमि में घुस कर, मुस्लिम खलीफा अल मुस्तासिम बगदाद को मारा था . इतिहास बताता है की अरब और फारसी मुस्लिमो ने लगातार २५० वर्ष (१०५० से १२५८) मध्य एशिया पर जिहादी आक्रमण करके तुर्क और मंगोल समूहों को छल-बल से मुस्लिम बनाने के लिए उन पर घोर अत्याचार किये (ठीक वैसे ही जैसे मुस्लिम बनाये जाने पर इन मुघल और तुर्को ने भारत और हिन्दुओ पर किये उन्हें मुस्लिम बनाने के लिए) .

इस बात से कुपित होकर मुस्लिम के विरोध में, मंगोलों ने चेंगिज खान के नेतृत्व में एक महाभयंकर, प्रति-आक्रमण मुस्लिम जगत पर किया . जिस में मंगोल सेना ने लगभग ५,०००,०००० मुस्लिमो का क़त्ल किया और बगदाद की मस्जिदों को मंगोलों (मुघलो) ने ध्वस्त करके कुरान को घोड़े की टापों के नीचे मसल दिया था .

चंगेज खान का पोता "हलाकू खान" एक कट्टर बौद्ध था . हलाकु ख़ान की पत्नी दोक़ुज़ ख़ातून एक नेस्टोरियाई ईसाई थी . हलाकु ने आगे चलकर एक बड़ा साम्राज्य स्थापित किया था , हलाकू के इलख़ानी साम्राज्य में बौद्ध धर्म और ईसाई धर्म को बढ़ावा दिया जाता था .

नवम्बर १२५७ में हलाकु की मंगोल फ़ौज ने बग़दाद की तरफ़ कूच किया जहाँ से ख़लीफ़ा अपना इस्लामी राज चलता था . चंगेज खान और हलाकू खान ने मध्य एशिया के इस्लामी देशो को बर्बरता से कुचला लेकिन उसने भारत पर कभी बुरी नजर नहीं डाली . भारत की सनातन पद्धतियों को भी मंगोलों ने अपने जन जीवन में शामिल किया था . चंगेज खान की समाधि पर लगा हुआ त्रिशूल, भगवान् शिव को समर्पित है . (05 सितंबर 2013 की पोस्ट)