Friday, 18 November 2016

ऐसा युद्ध जिसके बाद 150 वर्षों तक विदेशियों ने हमले करने का सोचा भी नहीं

बहराइच के पासी राजा भगवान सूर्य के उपासक थे। बहराइच में सूर्यकुंड पर स्थित भगवान सूर्य के मूर्ति की वे पूजा करते थे। इसी वक़्त हज़ारों हज़ार हिंदुओं को काटते और मुसलमान बनाते सालार महमूद बहराइच तक आ धमका। जैसे ही पता चला पासी राजा सुहेलदेव ने युद्ध की तैयारी शुरू कर दी, अपने अधीनस्थ सभी सूबे के राजाओं को खबर भेज दी गयी।

सालार मसूद के बहराइच आने के समाचार पाते ही बहराइच के राजा गण – राजा रायब, राजा सायब, अर्जुन भीखन गंग, शंकर, करन, बीरबर, जयपाल, श्रीपाल, हरपाल, हरख्, जोधारी व नरसिंह महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में लामबंद हो गये। ये राजा गण बहराइच शहर के उत्तर की ओर लगभग आठ मील की दूरी पर भकला नदी के किनारे अपनी सेना सहित उपस्थित हुए।

अभी ये युद्व की तैयारी कर ही रहे थे कि सालार मसूद ने उन पर रात्रि आक्रमण (शबखून) कर दिया। मगरिब की नमाज के बाद अपनी विशाल सेना के साथ वह भकला नदी की ओर बढ़ा और उसने सोती हुई हिंदु सेना पर आक्रमण कर दिया। इस अप्रत्याशित आक्रमण में दोनों ओर के अनेक सैनिक मारे गए लेकिन बहराइच की इस पहली लड़ाई मे सालार मसूद बिजयी रहा। पहली लड़ार्ऌ मे परास्त होने के पश्चात पुनः अगली लडाई हेतु हिंदू सेना संगठित होने लगी उन्होने रात्रि आक्रमण की संभावना पर ध्यान नही दिया।

उन्होने राजा सुहेलदेव के परामर्श पर आक्रमण के मार्ग में हजारो विषबुझी कीले अवश्य धरती में छिपा कर गाड़ दी। ऐसा रातों रात किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जब मसूद की धुडसवार सेना ने पुनः रात्रि आक्रमण किया तो वे इनकी चपेट मे आ गए। हालाकि हिंदू सेना इस युद्व मे भी परास्त हो गई लेकिन इस्लामी सेना के एक तिहायी सैनिक इस युक्ति प्रधान युद्ध मे मारे गए।

दो बार इस तरह से धोखे से सोते हुए में आक्रमण किये जाने से राजा सुहेल देव को इनकी असलियत समझ आ गयी थी। हिंदू सेना सचेत हो गई तथा महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में निर्णायक लड़ाई हेतु तैयार हो गई। कहते है इस युद्ध में प्रत्येक हिंदू परिवार से युवा हिंदू इस लड़ार्ऌ मे सम्मिलित हुए। महाराजा सुहेलदेव के शामिल होने से हिंदूओं का मनोबल बढ़ा हुआ था। लड़ाई का क्षेत्र चिंतौरा झील से हठीला और अनारकली झील तक फैला हुआ था।

जून, 1034 ई. को हुई इस लड़ाई में सालार मसूद ने युद्ध शुरू होते ही सामने हजारो गायों व बैलो को छोड़ा गया ताकि हिंदू सेना प्रभावी आक्रमण न कर सके लेकिन महाराजा सुहेलदेव की सेना पर इसका कोई भी प्रभाव न पड़ा। वे भूखे सिंहों की भाति इस्लामी सेना पर टूट पडे मीर नसरूल्लाह बहराइच के उत्तर बारह मील की दूरी पर स्थित ग्राम दिकोली के पास मारे गए। सैयर सालार समूद के भांजे सालार मिया रज्जब बहराइच के पूर्व तीन कि. मी. की दूरी पर स्थित ग्राम शाहपुर जोत यूसुफ के पास मार दिये गए। इनकी मृत्य 8 जून, 1034 ई 0 को हुई।

अब भारतीय सेना ने राजा करण के नेतृत्व में इस्लामी सेना के केंद्र पर आक्रमण किया जिसका नेतृत्व सालार मसूद स्वंय कर कहा था। उसने सालार मसूद को धेर लिया। इस पर सालार सैफुद्दीन अपनी सेना के साथ उनकी सहायता को आगे बढे भयकर युद्व हुआ जिसमें हजारों लोग मारे गए। स्वयं सालार सैफुद्दीन भी मारा गया उसकी समाधि बहराइच-नानपारा रेलवे लाइन के उत्तर बहराइच शहर के पास ही है। शाम हो जाने के कारण युद्व बंद हो गया और सेनाएं अपने शिविरों में लौट गई।

10 जून, 1034 को महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में हिंदू सेना ने सालार मसूद गाजी की फौज पर तूफानी गति से आक्रमण किया। इस युद्ध में सालार मसूद अपनी धोड़ी पर सवार होकर बड़ी वीरता के साथ लड़ा लेकिन अधिक देर तक ठहर न सका। राजा सुहेलदेव ने शीध्र ही उसे अपने बाण का निशाना बना लिया और उनके धनुष द्वारा छोड़ा गया एक विष बुझा बाण सालार मसूद के गले में आ लगा जिससे उसका प्राणांत हो गया। इसके दूसरे हीं दिन शिविर की देखभाल करने वाला सालार इब्राहीम भी बचे हुए सैनिको के साथ मारा गया। सैयद सालार मसूद गाजी को उसकी डेढ़ लाख इस्लामी सेना के साथ समाप्त करने के बाद महाराजा सुहेल देव ने विजय पर्व मनाया और इस महान विजय के उपलक्ष्य में कई पोखरे भी खुदवाए। वे विशाल ”विजय स्तंभ” का भी निर्माण कराना चाहते थे लेकिन वे इसे पूरा न कर सके। संभवतः यह वही स्थान है जिसे एक टीले के रूप मे श्रावस्ती से कुछ दूरी पर इकोना-बलरामपुर राजमार्ग पर देखा जा सकता है। हाँ दुःख की बात यही है कि हिन्दू उसी सालार को गाजी बाबा के नाम से पूजने उसके कब्र पर जाते हैं और सुहेलदेव कोई जानता तक नहीं।

लेकिन ये एक ऐसे युद्ध के रूप में जाना जाता है जिसमे हिन्दू राजाओं ने बहुत बुरी तरह से मुसलमानों का घमंड चूर चूर करके मिटटी में मिला दिया। इस्लामी सेना की इस पराजय के बाद भारतीय शूरवीरों का ऐसा आतंक विश्व में व्याप्त हो गया कि उसके बाद आने वाले 150 वर्षों तक किसी भी आक्रमणकारी को भारतवर्ष पर आक्रमण करने का साहस ही नहीं हुआ।

Thursday, 17 November 2016

बर्मा में फिर से सैकड़ों मुसलमानों को भून दिया गया

बर्मा में फिर से 130 मुसलमानों को वहाँ की सेना ने मार दिया है। इस पर हायतौबा मचे उससे पहले नोटबंदी में फंसी सरकार को देखना चाहिए कि हमेशा की तरह वहाँ से जान बचाकर भाग रहे सारे मुस्लमान भारत में याने बंगाल में घुसने का प्रयास करेंगे।
बर्मा में बहुत पहले ही मुस्लिमों को घुसपैठिया करार दिया जा चूका है। सरकार के ही तरफ से आदेश है कि मुसलमानों को देखते ही गोली मार दो या खदेड़ कर भगाओ लेकिन देश में रहने मत दो।

शायद ही किसी को विश्वास हो या जो दुनिया में कोई देश फैसला नहीं ले सकता वो सब बर्मा में लिया जाता है क्योंकि बौद्ध सन्त विराथु ने बहुत बड़ा अभियान चलाया था जिसने सरकार को कट्टरता अपनाने पर मजबूर कर दिया। विराथु जी सरकार को ये समझाने में सफल हुए कि मुस्लिम हैं तो देश में समस्या रहेगी।

इस बात का असर हुआ और सरकार ने मुसलमानों की नागरिकता ही समाप्त कर दी। किसी मुस्लमान के बच्चे को स्कूल में पढ़ने या घुसने की इजाजत तक नहीं है। सारे मस्जिदों को तोड़ कर धूल धूसरित कर दिया गया। किसी भी मुस्लिम को वापिस उस मस्जिद की मरम्मत की इजाजत नहीं थी।

मरम्मत की बात तो दूर है उनको आदेश दिया गया कि देश छोड़ कर अपना रास्ता नाप लें। इसके लिए सरकार ने किसी और को नहीं बल्कि सेना को ही आदेश दे डाला कि मुस्लिम को देश से निकालो। नतीजा बहुत बड़े पैमाने पर मुसलमानों को मारा गया। भगाया गया। समंदर के रास्ते भागते सारे मुसलमानों की फोटो दुनिया भर में देखि गयी। आधे समंदर में ही मर गए। ना जाने कितने जंगल से भागते हुए मारे गए। और कितनो को सेना ने ही मार दिया , बाकी को कट्टर बौद्ध संगठनों ने हमला करके मार डाला।

दुनिया भर में ये शायद पहली बार हुआ कि मुस्लिम समाज पर वो तरीका अपनाया गया जो खुद मुस्लिम दूसरे धर्म के लोगों के साथ करते हैं। जब खुद पर बीती तो हाय तौबा मच गयी। यूएन से लेकर सारे मानवाधिकार संगठन खड़े हो गए पर बर्मा अपने फैसले पर कायम रहा।

इसके पीछे बड़ी लंबी कहानी है। बिलकुल वैसी ही जैसी भारत की है, जैसे यहां कश्मीर में होता है, बंगाल में होता है या जैसे देश का विभाजन करवा दिया, ये लोग पुरे बर्मा के लिए आफत बने हुए थे, देश में वहाँ भी विभाजन की बात आ गयी थी, मुस्लिम ने अराकान प्रांत जो अलग करने घोषणा ही कर दी थी लेकिन खेल पलट गया, अचानक कड़े फैसले ले लिए गए, सेना को छूट दे दी गयी... सीधी बात थी कि मार डालो।

आज बर्मा में मुस्लिम खोजे से नहीं मिलेंगे। या तो सीमा के बाहर शिविर में रुकते हैं या भाग कर बंगाल में घुसते हैं या कहीं और देश में चले जाते हैं। आज फिर न्यूज़ आ रही है कि 130 मुसलमानों को सेना ने भून डाला है। ये वो लोग है जो सीमा के बाहर से बार बार घुसने का प्रयास करते रहते हैं। अब वो भारत तो है नहीं, मारे जाते हैं।

Monday, 7 November 2016

नागा साधु आत्मघाती दस्ता बनने को तैयार

इसका मतलब होगा कि किसी तरह से एक आत्मघाती हमलावर को हाफिज सईद या मसूद अजहर के सभाओं में भेज दो बस ... खेल खत्म । लोग कहते हैं मर कर मारने के लिए जिहाद का पागलपन होना चाहिए... उन्हें ये न्यूज़ ध्यान से पढ़ लेना चाहिए.... धर्म और राष्ट्र के लिए मर कर मारने का जुनून सिर्फ हिन्दू धर्म में ही हो सकता है।
अब ये डोभाल जी पर है कि वो कैसे और कब इश्तेमाल करना चाहेंगे।

कुछ लोगों को ये गलतफहमी भी दूर कर लेनी चाहिए कि साधु संतों की नजर देश में घट रहे घटनाक्रम पर नहीं होती है। #नागा_साधु

Wednesday, 2 November 2016

राहुल की सभा में जब भगोड़े कैदी पहुंचे

राहुल गांधी जी एक जगह भाषण दे रहे थे.. माइक पर चिल्ला रहे थे ..
"भाइयों.. बताइये.. जेल से अपराधी भाग जाते हैं, तो क्या उनको मार दिया जायेगा ? अगर उनको पकड़ा जा सकता है तो क्यों मारा जाये ? बताइये.. ये कैसी मोदीजी की सरकार... ?

(तभी स्टेज पर एक पुलिस वाला आ गया... राहुल जी के कान में बोला...)

"सर बगल के जेल से 8 खूंखार आतंकवादी भाग गए हैं और इधर ही आये हैं .. ऐसा अंदेशा है "

राहुल गांधी की घिग्घी बंध गयी...
"क... क्या ?... ऐसा कैसे ? जेल तो यहां से 4  किलोमीटर दूर है तो वो लोग यहाँ तक कैसे आ गये ? मार देना चाहिए था ना.... मम्मी.... "

"नहीं सर वो हमलोग जेल से ही पीछा कर रहे थे... हमलोगों ने सोचा कि मार दें ... फिर सोचा आपलोग ही तो..."

"अरे .. यार मरवाएगा तू तो.. अब जान फंस गयी ना, राजनीती अलग चीज होती है यार.. चलो जल्दी से मेरे चारों तरफ घेरा बनाओ और जल्दी से मुझे मेरे घर पहुंचा दो.... भाषण वाशन बाद में.. जान बची तो लाखों पाए... "

आत्महत्या करने वाले रामकिशन को किस बात का दुःख था

रामकिशन जी ने आत्महत्या कर ली क्योंकि orop के पेंशन वाले डिमांड उनके अनुसार सरकार ने नहीं मानी। मैं कंफ्यूज हूँ... कुछ ही महीने पहले की बात है जब orop को सरकार ने मान लिया था, बजट में घोषणा हुई थी और मार्च से सभी के खाते में OROP का पेंशन जा भी रहा है।  खुद मोदीजी ने कई जगह ऐसा कहा था कि कांग्रेस के समय लटके इस बिल को मैंने पास किया है। शायद रामकिशन जी इस बिल में जो चाहते थे वो पूर्णतया नहीं हुआ होगा।
लेकिन मैं रामकिशन जी की मौत के बाद भी उनकी दुखी आत्मा से पूछना चाहता हूँ ..

क्या रामकिशन जी ने कभी देखा था कि कोई प्रधानमंत्री सीमा पर जाकर सैनिकों के साथ दीपावली मनाता है ? क्या कभी रामकिशन जी ने देखा था कि पत्थरबाजों से सिर्फ पत्थर खाने को नहीं बल्कि जवाब देने को भी किसी सरकार ने आदेश दिया हो ? क्या आज से पहले सैनिको के शहीद होने पर पूरा देश कभी ग़मगीन हुआ था? आज सोशल मीडिया से लेकर हरेक न्यूज़ चैनल पर शहीद की विधवा, बच्चे, माँ बाप को प्राथमिकता दी जाती है, ऐसा कभी हुआ था ? पहले कितने सैनिक मरे ये पता भी नहीं चलता था, आज एक एक की गिनती होती है और उसके बदले की बात कही जाती है। सर्जिकल स्ट्राइक किसके लिए किया गया था ?

उड़ी हमले में 14 सैनिकों की हत्या का बदला लिया गया .. क्योंकि सरकार सैनिकों की हत्या से बेहद व्यथित थी..ऐसा पहले कभी नही हुआ था। रामकिशन जी ने देखना चाहिए था कि सैनिकों को मजबूत करने के लिए रूस से, अमेरिका से , इजराइल से सामान खरीदने के लिए पूरा खजाना उलट दिया गया ताकि सैनिकों के पास बेहतर सुरक्षा और आक्रमण व्यवस्था हो।

रामकिशन जी आपकी OROP सही होगी.. होनी चाहिए थी.. लेकिन जो मोदीजी दिन रात आपके लिए इतना कुछ कर रहे थे वो भी देखना चाहिए था... आपलोग को पेंशन मिल रहा है लेकिन उसको बढ़ाने के लिए इतना कुछ करते हो ...... जबकि यहाँ करोड़ों प्राइवेट सेक्टर के लोग किसी भी उम्र में बिना पेंशन के लात मारकर यूँही निकाल दिए जाते हैं। कोई आत्महत्या नहीं करता सभी लड़ते हैं जिंदगी में।

कम से कम आत्महत्या करके आपने मोदीजी के साथ अहसानफरामोशी ही किया है।

Tuesday, 1 November 2016

आखिर दूसरे देश के राष्ट्राध्यक्षों को हिन्दू स्मारक क्यों नहीं दिखाया जाता

हमारे देश की पहचान हिंदुओं के प्राचीन स्थल हैं लेकिन देश का दुर्भाग्य है कि पहले ताजमहल और हुमायूँ का मकबरा दिखाया जाता था और अब गांधी जी का चरखा। भारत की संस्कृति तो सदैव से भारत के विशालकाय मन्दिरों, स्तूपों, विहारों, चैत्यों, स्थानकों तथा गुरुद्वारों में वास करती है।

अन्तरराष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत में भी मुख्यत: भारत के मन्दिरों को ही दर्शाया गया है। क्या कोणार्क का सूर्य मन्दिर,
खजुराहो के समूह मन्दिर,
महाबलिपुरम के मंदिर,
तंजाबुर का वृहदेश्वर मन्दिर,
मदुरै का मीनाक्षीपुरम मन्दिर ....
भारतीय संस्कृति का सही चित्र प्रस्तुत नहीं करते?

क्या अजन्ता,
एलोरा,
एलीफेन्टा,
उदयगिरि की गुफाएं ..... विश्व-कौतुहल तथा संस्कृति की मूल जानकारी देने के स्थल नहीं हैं?

क्या विजयनगर (हम्पी) के खण्डहर आज के अनेक नवनिर्मित नगरों से अधिक सुव्यवस्थित जानकारी नहीं देते?
सांची का स्तूप,
अशोक के अभिलेख,
बाहुबलि स्वामी की विशालकाय प्रतिमा,
सारनाथ में बुद्ध की अद्वितीय प्रतिमा ...... क्या भारतीय संस्कृति की सही जीवन दृष्टि नहीं दर्शाते हैं?

राम की जन्मभूमि अयोध्या,
कृष्ण की कर्मभूमि कुरुक्षेत्र,
विश्व को भारतीय संस्कृति से अवगत कराने वाले स्वामी विवेकानन्द का शिला स्मारक ...... क्या विश्व को आज भी आश्चर्यचकित तथा नतमस्तक होने को बाध्य नहीं करते?

पता नहीं क्यों जान बूझकर जब भी कोई भारत में बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष या अतिथि आते हैं तो भारत के असली गौरव चिन्ह को नजरअंदाज किया जाता है, शायद इसलिए कि हिंदुओं की महानता, विशालता, पराक्रम आदि का बोध किसी को ना हो। अब तो हालात ये हैं कि भेड़चाल में खुद हिन्दू ऐसी जगहों पर ना जा के ताजमहल और अजमेर के ख्वाजा जैसी घटिया जगहों के चक्कर लगा कर अपने टूरिज्म को सम्पन्न कर लेते हैं।

हिन्दू स्वाभिमान का प्रतीक विजयनगर साम्राज्य

19वीं शताब्दी में हुए तराईन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद संपूर्ण भारतवर्ष में हताशा और निराशा का जो अंधकार छा गया था, देवगिरि के यदुवंशी राजा रामचन्द्र (1271-1311) की पराजय के पश्चात और भी घना हो गया। अलाउद्दीन खिलजी ने इस वंश का सर्वस्व छीनकर इसे दर-दर का भिखारी बना दिया था। मजबूर होकर राजा रामचन्द्र ने मतांतरण कर लिया। देवगिरि राज्य का कत्लेआम विश्व का जघन्यतम कृत्य था। देवल देवी और खुसरो खान के पुन: हिन्दू होकर एक वर्ष तक राज्य करने के कालखंड (1320-1321) को छोड़ दें तो यह युग हिन्दू समाज के लिए पराजय और प्रताड़ना का युग था।

हरिहर और बुक्काराय का इतिहास

इसी युग में काकतीय वंश के कृष्णप्पा ने विजय नगर बसाया। उनके पुत्र हरिहर और बुक्काराय शिकार खेलने यहां आया करते थे और यहीं उन्होंने तपस्यारत विद्यारण्य स्वामी से दीक्षा ग्रहण करके इसे विद्यानगर के नाम से राजधानी बनाने का व्रत लिया था। कृष्णप्पा नायक की राजधानी वारंगल पर निजामशाही का अधिकार हो जाने के पश्चात वे कम्पली चले आये थे और वहां के राजा प्रताप रुद्र के यहां खजांची नियुक्त हुए थे। पर दिल्ली के सुल्तान की सेना कम्पली के राजा को पराजित करके हरिहर और बुक्काराय को दिल्ली ले आयी और इन्हें मुसलमान बना लिया गया। मुसलमान बनने से आश्वस्त होकर सुल्तान ने इन्हें कर्नाटक का सूबेदार बनाकर भेजा। पर वे विद्यारण्य के शिष्य थे, उनके प्रभाव में आकर पुन: हिन्दू बने और पहले तो अनेगुण्डी को अपनी राजधानी बनाया और फिर विद्यारण्य स्वामी के निर्देशानुसार हनुमान जी के जन्मस्थल हेमकूट के चारों ओर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की।

हरिहर और बुक्काराय के वंश की 12 पीढ़ियों ने 1336 से सन् 1485 तक शासन किया और हिन्दू राज्य की स्थिरता के विषय में समाज को अश्वस्त किया और दिखाया कि शस्त्र और शास्त्र दोनों में एक साथ प्रवीणता प्राप्त की जा सकती है। विद्यारण्य स्वामी कुदली श्रृंगेरी के शाखा मठ श्रृंगेरी के व्याख्यात पीठाधिपति होकर भी राजाओं के मार्गदर्शक रहे और अपने भाई सायण के साथ उन्होंने वेदों के उपासनापरक भाष्य में सहयोग भी दिया।

संगम वंश का उदय

हरिहर और बुक्काराय के तीन भाई कम्ब, मरपा और मुद्दप्पा थे। इनमें इतना प्रेम था कि सबने मिलकर अगला राजा कम्ब के पुत्र संगम (द्वितीय) और बाद में हरिहर (द्वितीय) को बनाया। पिता का नाम संगम होने के कारण यह वंश संगम वंश के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। इन्होंने वारंगल के सूबेदार इमादुल मुल्क से लेकर दिल्ली के सुल्तानों तक से युद्ध किया। कभी हारे कभी जीते, पर अभिमान कभी नहीं किया और राज्य की सीमा पूर्व समुद्र से पश्चिमी समुद्र तक फैलाते गये। इसी समय में बहमनी, आदिलशाही, कुतुबशाही आदि राज्य स्थापित हो रहे थे, जिसमें तीन सुन्नी और दो शिया थे। इनमें परस्पर युद्ध हुआ करते थे। सन् 1366 से विजयनगर पर आक्रमण में 5 लाख लोग निहत हुए। मुहम्मद बहमनी ने कसम खाई थी कि वह 1 लाख हिन्दुओं को मारेगा।

संगम वंश का अंतिम राजा विरुपाक्ष (द्वितीय) अपने विलासी पुत्र के हाथों मारा गया। तत्पश्चात सरदारों ने चुनाव किया और सलुआ नृसिंह को राजा बनाया गया। इस वंश में सन् 1485 से 1505 तक सलुवा नृसिंह देव राय, तिम्म भूपाल और नृसिंह राय (द्वितीय) नाम से 3 राजा हुए। अंतिम राजा के जीवनकाल में ही राज्य का शासन एक अनुन्नत वंश के तेजस्वी सेनापति तुलुआ नरसा नायक के हाथों चला गया था। ये तुलुआ क्षेत्र के थे जो उत्तर कर्नाटक और गोआ के अन्तर्गत आता है। वहां से ये आंध्र के विभिन्न राज्यों मे फैले।

नृसिंह राय का कालखण्ड

इस्लामी शक्तियों से निरन्तर संघर्ष के बावजूद नरसा नायक को उत्तराधिकार में विशाल साम्राज्य मिला था। ये नायडू कुल की कापू शाखा के थे और गोत्र का निश्चित पता न होने के कारण इन्हें कश्यप गोत्र का माना जाता है। इम्मादि नृसिंह राय के पुत्रों ने शिलालेख लगवाया था कि-

आ: गंगातीर-लंका प्रथम कारम्

भूभृत ताड़ान्तम् नितान्तम्।

ख्यात:क्षोणीपति नाम स्रत्रभ

इव शीर्षा शासनं यो व्यतानीत।।

अर्थात उस समय उत्कल के राजा की सीमाएं बंगाल में गंगा को छूती थीं जो इम्मादि के करद राजा थे और लगभग 200 क्षत्रपों में से एक श्रीलंका में राज्य करते थे। एक अन्य शिलालेख, व्प्राज्ञ भुज भुजग सन्निहि तन्यश सबल हूता हित क्षितिपति रक्ताल्य नृसिंह नृप साम्राज्य रमाभरण सुकवि राजोद्वरणव् के अनुसार श्री नृसिंह साम्राज्य की विशालता का परिचय मिलता है। नृसिंह राय द्वितीय के जीवनकाल में ही ईश्वर नायक के पुत्र नरसा नायक के हाथों में शासन की बागडोर आ गयी थी। इन दोनों के नाम दीर्घकाल तक शिलालेखों में मिलते हैं। अत: जब मुख्य सेनापति ईश्वर नायक के पुत्र नरसा नायक राजा बन गये तो इसे सहज रूप में स्वीकार कर लिया गया। सन् 1491 से 1503 तक इनका राज्यकाल माना जाता है।

वीर नृसिंह राय इनके बाद राजा हुए। इनका राज्यकाल 1509 तक चला। बीदर के सुल्तान के जिहाद का दमन करने का श्रेय इन्हें ही है। राज्य में जिस ओर भी विद्रोह की सुगबुगाहट हुई, उसे शांत नृसिंह राय ने किया और कावेरी से तृंगभद्रा नदी के बीच के दोआब में प्रशासन तंत्र को सुदृढ़ बनाया। सैन्य प्रशिक्षण को क्रमबद्ध किया और सेना में सभी के प्रवेश के लिए द्वार खोल दिया। पुर्तगाल से दौत्य सम्पर्क स्थापित करके व्यापारिक समझौते को नियमित किया और विवाह पर से कर वसूली को समाप्त किया। एक आदर्श राज्य में जो कुछ संभव था उसकी संकल्पना और प्रारूप वीर नृसिंह राय ने की थी। उन्होंने ही अपने भाइयों, भुजबल नृसिंह राय, अच्युत राय और रंग राय से वरीयता देकर श्री कृष्णदेव राय का टीका किया। परम्परानुसार भुजबल ज्येष्ठ थे, पर उन्होंने सेनापति रहकर राज्य की रक्षा करने वाले कृष्णदेव राय का समर्थन किया। दलनायकों की सभा ने भी कृष्णदेव राय का समर्थन किया और राय वाचकमु के अनुसार-26 जुलाई, 1509 को कृष्णदेव राय का टीका हुआ। वीर नृसिंह राय की मृत्यु के पश्चात उनका जन्माष्टमी को अभिषेक हुआ और 28 जनवरी, 1510 को सिंहासन पर आरुढ़ हुए।

राजा कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक

आयर्दान महोत्सवस्व विनत क्षोनी भृता मूर्तिमान विश्वासो नयनोत्सवो मृगदृशां-कीत्र्ते:प्रकाश:पर:। आनंद:कलिताकृति:वीरोश्रियो जीवितं धर्मस्यैष निकेतनं विजयते श्रीकृष्ण देव राय:नृप:।

विजया कुमारी और सेपुरी भास्कर के अनुसार कृष्णदेव राय का जन्म नायडू वंश के कापू कुल में हुआ था, किन्तु पितामह ईश्वर नायडू और पिता नरसा नायडू के सलुआ राजाओं के मुख्य सेनापति होने के कारण उनकी शिक्षा-दीक्षा भी राजकुमारों के साथ हुई थी और बाल्यकाल से ही वे शस्त्र और शास्त्र में निपुण हो गये थे। किशोरवय से ही पिता के साथ युद्ध संचालन और राजनीति की पेचीदयों को सुलझाने में प्रवीणता प्राप्त की थी। वे दक्षिण के बहमनी, कुतुबशाही, आदिलशाही, बीदर आदि सुल्तानों की रीति-नीति से पूर्ण परिचित थे और अपने भाइयों और राजकुमार के ढुलमुल चरित्र को देखते हुए उन्होंने उन्हें चन्द्रगिरि के किले में नजरबंद रखा और शासन के प्रारंभिक वर्षों में विजयनगर छोड़कर कहीं नहीं गये।

कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक

कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक 20 वर्ष की आयु में हुआ था। वे माता-पिता के परम भक्त थे। उनके नाम पर उन्होंने नगर भी बसाए गए। उनकी दो पत्नियां थीं, पर वे धर्मकार्य में सहयोगिनी थीं और राज्यकार्य में उनका हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं था। आगे चलकर राजनीतिक कारणों से उन्होंने कलिंग के राजा प्रताप रुद्र की कन्या जगन्मोहिनी से विवाह किया था। इसके बावजूद कृष्णदेव राय का जीवन विलासी नहीं था। वे ब्राहृमुहुत्र्त में उठ जाते थे। नित्यकर्म के पश्चात व्यायाम करते थे जिसमें भारोत्तोलन, फुत्र्ती के व्यायाम तथा घुड़सवारी सम्मिलित थे। वे इष्टदेव की अर्चना के लिए देवालय जाते थे। लौटकर मंत्रिपरिषद की सभा में भाग लेकर खुले दरबार में पधारते थे। वे बिजली की तरह चपल थे और आलस्य उन्हें छू नहीं गया था।

कृष्णदेव राय राजा होते ही उन्होंने अपनी उत्तर और पूर्व सीमा को शत्रुओं से घिरा पाया। सर्वप्रथम उन्होंने तिम्मा जैसे अनुभवी मंत्रियों के सहयोग से प्रत्यक्ष शासित राज्य की सुव्यवस्था की और विभिन्न मंत्रालयों के मत्रियों की नियुक्ति करके शासन संचालन के लिए परिषदों की नियुक्ति की, राज्य को छ: प्रांतों में विभाजित किया और 200 सूबेदारों की नियुक्ति की। उनकी सेना और आंतरिक सुरक्षा के विभाग अलग-अलग नहीं थे और सूबेदारों की गतिविधि पर दृष्टि रखने के लिए गुप्तचर सेवा बहुत प्रभावी थी।

सेना की व्यवस्था पर उनकी विशेष नजर रहती थी। हाथियों और घुड़सवारों की संख्या मिलाकर उनकी कुल सैन्य शक्ति सोलह लाख थी जो आज के भारत की कुल सैन्य शक्ति से अधिक नहीं तो समकक्ष तो अवश्य रही होगी। वे अश्वशक्ति (घुड़सवारों) पर विशेष ध्यान देते थे और इसीलिए गोवा के पुर्तगाली शासकों से संबंध बनाए ताकि घोड़ों से लदे जहाज सुविधापूर्वक आ सकें।