Tuesday, 1 November 2016

हिन्दू स्वाभिमान का प्रतीक विजयनगर साम्राज्य

19वीं शताब्दी में हुए तराईन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की पराजय के बाद संपूर्ण भारतवर्ष में हताशा और निराशा का जो अंधकार छा गया था, देवगिरि के यदुवंशी राजा रामचन्द्र (1271-1311) की पराजय के पश्चात और भी घना हो गया। अलाउद्दीन खिलजी ने इस वंश का सर्वस्व छीनकर इसे दर-दर का भिखारी बना दिया था। मजबूर होकर राजा रामचन्द्र ने मतांतरण कर लिया। देवगिरि राज्य का कत्लेआम विश्व का जघन्यतम कृत्य था। देवल देवी और खुसरो खान के पुन: हिन्दू होकर एक वर्ष तक राज्य करने के कालखंड (1320-1321) को छोड़ दें तो यह युग हिन्दू समाज के लिए पराजय और प्रताड़ना का युग था।

हरिहर और बुक्काराय का इतिहास

इसी युग में काकतीय वंश के कृष्णप्पा ने विजय नगर बसाया। उनके पुत्र हरिहर और बुक्काराय शिकार खेलने यहां आया करते थे और यहीं उन्होंने तपस्यारत विद्यारण्य स्वामी से दीक्षा ग्रहण करके इसे विद्यानगर के नाम से राजधानी बनाने का व्रत लिया था। कृष्णप्पा नायक की राजधानी वारंगल पर निजामशाही का अधिकार हो जाने के पश्चात वे कम्पली चले आये थे और वहां के राजा प्रताप रुद्र के यहां खजांची नियुक्त हुए थे। पर दिल्ली के सुल्तान की सेना कम्पली के राजा को पराजित करके हरिहर और बुक्काराय को दिल्ली ले आयी और इन्हें मुसलमान बना लिया गया। मुसलमान बनने से आश्वस्त होकर सुल्तान ने इन्हें कर्नाटक का सूबेदार बनाकर भेजा। पर वे विद्यारण्य के शिष्य थे, उनके प्रभाव में आकर पुन: हिन्दू बने और पहले तो अनेगुण्डी को अपनी राजधानी बनाया और फिर विद्यारण्य स्वामी के निर्देशानुसार हनुमान जी के जन्मस्थल हेमकूट के चारों ओर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की।

हरिहर और बुक्काराय के वंश की 12 पीढ़ियों ने 1336 से सन् 1485 तक शासन किया और हिन्दू राज्य की स्थिरता के विषय में समाज को अश्वस्त किया और दिखाया कि शस्त्र और शास्त्र दोनों में एक साथ प्रवीणता प्राप्त की जा सकती है। विद्यारण्य स्वामी कुदली श्रृंगेरी के शाखा मठ श्रृंगेरी के व्याख्यात पीठाधिपति होकर भी राजाओं के मार्गदर्शक रहे और अपने भाई सायण के साथ उन्होंने वेदों के उपासनापरक भाष्य में सहयोग भी दिया।

संगम वंश का उदय

हरिहर और बुक्काराय के तीन भाई कम्ब, मरपा और मुद्दप्पा थे। इनमें इतना प्रेम था कि सबने मिलकर अगला राजा कम्ब के पुत्र संगम (द्वितीय) और बाद में हरिहर (द्वितीय) को बनाया। पिता का नाम संगम होने के कारण यह वंश संगम वंश के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। इन्होंने वारंगल के सूबेदार इमादुल मुल्क से लेकर दिल्ली के सुल्तानों तक से युद्ध किया। कभी हारे कभी जीते, पर अभिमान कभी नहीं किया और राज्य की सीमा पूर्व समुद्र से पश्चिमी समुद्र तक फैलाते गये। इसी समय में बहमनी, आदिलशाही, कुतुबशाही आदि राज्य स्थापित हो रहे थे, जिसमें तीन सुन्नी और दो शिया थे। इनमें परस्पर युद्ध हुआ करते थे। सन् 1366 से विजयनगर पर आक्रमण में 5 लाख लोग निहत हुए। मुहम्मद बहमनी ने कसम खाई थी कि वह 1 लाख हिन्दुओं को मारेगा।

संगम वंश का अंतिम राजा विरुपाक्ष (द्वितीय) अपने विलासी पुत्र के हाथों मारा गया। तत्पश्चात सरदारों ने चुनाव किया और सलुआ नृसिंह को राजा बनाया गया। इस वंश में सन् 1485 से 1505 तक सलुवा नृसिंह देव राय, तिम्म भूपाल और नृसिंह राय (द्वितीय) नाम से 3 राजा हुए। अंतिम राजा के जीवनकाल में ही राज्य का शासन एक अनुन्नत वंश के तेजस्वी सेनापति तुलुआ नरसा नायक के हाथों चला गया था। ये तुलुआ क्षेत्र के थे जो उत्तर कर्नाटक और गोआ के अन्तर्गत आता है। वहां से ये आंध्र के विभिन्न राज्यों मे फैले।

नृसिंह राय का कालखण्ड

इस्लामी शक्तियों से निरन्तर संघर्ष के बावजूद नरसा नायक को उत्तराधिकार में विशाल साम्राज्य मिला था। ये नायडू कुल की कापू शाखा के थे और गोत्र का निश्चित पता न होने के कारण इन्हें कश्यप गोत्र का माना जाता है। इम्मादि नृसिंह राय के पुत्रों ने शिलालेख लगवाया था कि-

आ: गंगातीर-लंका प्रथम कारम्

भूभृत ताड़ान्तम् नितान्तम्।

ख्यात:क्षोणीपति नाम स्रत्रभ

इव शीर्षा शासनं यो व्यतानीत।।

अर्थात उस समय उत्कल के राजा की सीमाएं बंगाल में गंगा को छूती थीं जो इम्मादि के करद राजा थे और लगभग 200 क्षत्रपों में से एक श्रीलंका में राज्य करते थे। एक अन्य शिलालेख, व्प्राज्ञ भुज भुजग सन्निहि तन्यश सबल हूता हित क्षितिपति रक्ताल्य नृसिंह नृप साम्राज्य रमाभरण सुकवि राजोद्वरणव् के अनुसार श्री नृसिंह साम्राज्य की विशालता का परिचय मिलता है। नृसिंह राय द्वितीय के जीवनकाल में ही ईश्वर नायक के पुत्र नरसा नायक के हाथों में शासन की बागडोर आ गयी थी। इन दोनों के नाम दीर्घकाल तक शिलालेखों में मिलते हैं। अत: जब मुख्य सेनापति ईश्वर नायक के पुत्र नरसा नायक राजा बन गये तो इसे सहज रूप में स्वीकार कर लिया गया। सन् 1491 से 1503 तक इनका राज्यकाल माना जाता है।

वीर नृसिंह राय इनके बाद राजा हुए। इनका राज्यकाल 1509 तक चला। बीदर के सुल्तान के जिहाद का दमन करने का श्रेय इन्हें ही है। राज्य में जिस ओर भी विद्रोह की सुगबुगाहट हुई, उसे शांत नृसिंह राय ने किया और कावेरी से तृंगभद्रा नदी के बीच के दोआब में प्रशासन तंत्र को सुदृढ़ बनाया। सैन्य प्रशिक्षण को क्रमबद्ध किया और सेना में सभी के प्रवेश के लिए द्वार खोल दिया। पुर्तगाल से दौत्य सम्पर्क स्थापित करके व्यापारिक समझौते को नियमित किया और विवाह पर से कर वसूली को समाप्त किया। एक आदर्श राज्य में जो कुछ संभव था उसकी संकल्पना और प्रारूप वीर नृसिंह राय ने की थी। उन्होंने ही अपने भाइयों, भुजबल नृसिंह राय, अच्युत राय और रंग राय से वरीयता देकर श्री कृष्णदेव राय का टीका किया। परम्परानुसार भुजबल ज्येष्ठ थे, पर उन्होंने सेनापति रहकर राज्य की रक्षा करने वाले कृष्णदेव राय का समर्थन किया। दलनायकों की सभा ने भी कृष्णदेव राय का समर्थन किया और राय वाचकमु के अनुसार-26 जुलाई, 1509 को कृष्णदेव राय का टीका हुआ। वीर नृसिंह राय की मृत्यु के पश्चात उनका जन्माष्टमी को अभिषेक हुआ और 28 जनवरी, 1510 को सिंहासन पर आरुढ़ हुए।

राजा कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक

आयर्दान महोत्सवस्व विनत क्षोनी भृता मूर्तिमान विश्वासो नयनोत्सवो मृगदृशां-कीत्र्ते:प्रकाश:पर:। आनंद:कलिताकृति:वीरोश्रियो जीवितं धर्मस्यैष निकेतनं विजयते श्रीकृष्ण देव राय:नृप:।

विजया कुमारी और सेपुरी भास्कर के अनुसार कृष्णदेव राय का जन्म नायडू वंश के कापू कुल में हुआ था, किन्तु पितामह ईश्वर नायडू और पिता नरसा नायडू के सलुआ राजाओं के मुख्य सेनापति होने के कारण उनकी शिक्षा-दीक्षा भी राजकुमारों के साथ हुई थी और बाल्यकाल से ही वे शस्त्र और शास्त्र में निपुण हो गये थे। किशोरवय से ही पिता के साथ युद्ध संचालन और राजनीति की पेचीदयों को सुलझाने में प्रवीणता प्राप्त की थी। वे दक्षिण के बहमनी, कुतुबशाही, आदिलशाही, बीदर आदि सुल्तानों की रीति-नीति से पूर्ण परिचित थे और अपने भाइयों और राजकुमार के ढुलमुल चरित्र को देखते हुए उन्होंने उन्हें चन्द्रगिरि के किले में नजरबंद रखा और शासन के प्रारंभिक वर्षों में विजयनगर छोड़कर कहीं नहीं गये।

कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक

कृष्णदेव राय का राज्याभिषेक 20 वर्ष की आयु में हुआ था। वे माता-पिता के परम भक्त थे। उनके नाम पर उन्होंने नगर भी बसाए गए। उनकी दो पत्नियां थीं, पर वे धर्मकार्य में सहयोगिनी थीं और राज्यकार्य में उनका हस्तक्षेप बिल्कुल नहीं था। आगे चलकर राजनीतिक कारणों से उन्होंने कलिंग के राजा प्रताप रुद्र की कन्या जगन्मोहिनी से विवाह किया था। इसके बावजूद कृष्णदेव राय का जीवन विलासी नहीं था। वे ब्राहृमुहुत्र्त में उठ जाते थे। नित्यकर्म के पश्चात व्यायाम करते थे जिसमें भारोत्तोलन, फुत्र्ती के व्यायाम तथा घुड़सवारी सम्मिलित थे। वे इष्टदेव की अर्चना के लिए देवालय जाते थे। लौटकर मंत्रिपरिषद की सभा में भाग लेकर खुले दरबार में पधारते थे। वे बिजली की तरह चपल थे और आलस्य उन्हें छू नहीं गया था।

कृष्णदेव राय राजा होते ही उन्होंने अपनी उत्तर और पूर्व सीमा को शत्रुओं से घिरा पाया। सर्वप्रथम उन्होंने तिम्मा जैसे अनुभवी मंत्रियों के सहयोग से प्रत्यक्ष शासित राज्य की सुव्यवस्था की और विभिन्न मंत्रालयों के मत्रियों की नियुक्ति करके शासन संचालन के लिए परिषदों की नियुक्ति की, राज्य को छ: प्रांतों में विभाजित किया और 200 सूबेदारों की नियुक्ति की। उनकी सेना और आंतरिक सुरक्षा के विभाग अलग-अलग नहीं थे और सूबेदारों की गतिविधि पर दृष्टि रखने के लिए गुप्तचर सेवा बहुत प्रभावी थी।

सेना की व्यवस्था पर उनकी विशेष नजर रहती थी। हाथियों और घुड़सवारों की संख्या मिलाकर उनकी कुल सैन्य शक्ति सोलह लाख थी जो आज के भारत की कुल सैन्य शक्ति से अधिक नहीं तो समकक्ष तो अवश्य रही होगी। वे अश्वशक्ति (घुड़सवारों) पर विशेष ध्यान देते थे और इसीलिए गोवा के पुर्तगाली शासकों से संबंध बनाए ताकि घोड़ों से लदे जहाज सुविधापूर्वक आ सकें। 

Monday, 31 October 2016

दुनिया के सर्वश्रेष्ठ महिला स्नाइपर

ऐसा नहीं है कि सिर्फ पुरुष ही अच्छे स्नाइपर रहे हैं, कम से कम एक नाम तो रुसी महिला सैनिक का भी है जिसका नाम है Lyudmila Pavlichenko. विश्विद्यालय में पढ़ने वाली लड़की को उस दिन काफी दुःख हुआ जब इसने अपने विश्विद्यालय को नाजियों ने अपने बमवर्षा से उड़ा दिया। ये सीधे मिलिट्री में भर्ती होने गयी।

पर ये आसान नहीं था, वहाँ कहा गया कि ये आपका काम नहीं है ये मर्दों का काम है, जब ये नहीं मानी तो मिल्ट्री अस्पताल में घायल सैनिकों की सेवा में लगा दिया गया, लेकिन एक दिन इन्होंने कमांडर के सामने जिद पकड़ ली कि इसे लड़ाई में ही हिस्सा लेना है।

ठीक है, फिर इन्हें राइफल चलाने की ट्रेनिंग दी गयी। एक दिन जब लड़ाई में शामिल थी और सामने दुश्मन थे तो उंगलियां कांपने लगी, बगल में मौजूद सैनिक गोली चलाने को कह रहे थे... पर ये हो नहीं पा रहा था... अचानक से एक गोली आयी और बगल में मौजूद उस शख्श के सर को उड़ाती चली गयी... वही जो इसे गोली चलाने को कह रहा था... बस परिस्थति बदल गयी... Lyudmila Pavlichenko, ने मरे हुए दोस्त को देखा और ट्रिगर दबा दिया... इसके बाद आगे के वर्षों में जो हुआ वो इतिहास है।

स्नाइपर के लिए सबसे जरुरी उसके कपडे भी होते हैं। ये काले लबादे में होती थी। दुश्मन का ध्यान बंटाने के लिए अपने स्कार्फ को कहीं किसी छोटे पेड़ की टहनी में बाँध देती, जहां स्कार्फ़ हवा से उड़ती रहती, जब दुश्मन वहाँ पहुँचते तो कुछ ही देर में बारी बारी से सबको उड़ा देती।
चाहे बरसात हो या तूफ़ान निशाना चुकता नहीं था।

एक बार वो पेड़ पर चढ़ कर ऊपर से निशाने लगा रही थी, विरोधी दुश्मन की गोली आयी और पेड़ की शाखा को तोड़ते निकल गयी, Lyudmila Pavlichenko ऊंचाई से नीचे गिर पड़ी, वो पड़ी रही, खून बहता रहा, वो जैसे कोमा में थी, हिल डुल नहीं सकती थी, उसे लगा वो मर चुकी है.... घंटो बीत गए, शरीर जैसे का तैसा पड़ा था, सुबह से शाम हो गयी, फिर रात आयी... और पता नहीं कहाँ से जान आयी, उसने आँखें खोली, उठी और चल पड़ी अपने कैम्प की तरफ।

एक बार की लड़ाई में एक गोली उसे भी आकर लगी, और साथ में रहे सारे कमांडर और सैनिक मारे गए, वो घायल थी, कमांडर के मरने से सैनिक भागने लगे... तब वो चीखी... "कायरों भागते कहाँ हो , देखो एक महिला सबके सामने लड़ने को खड़ी है, और तुम मर्द होकर भागते हो '"... सैनिकों के भागते पांव रुक गए।
उसके बाद उस लड़ाई की कमांडिंग उसी समय उसने ले ली। उसने घायल होकर भी कमांडर का रोल निभाया।

एक स्नाइपर को इंतज़ार करना सिखाया जाता है, सांसें रोके वो दुश्मन के निशाने पर आने का इंतज़ार करता है। इसी कड़ी में एक बार Lyudmila Pavlichenko की मुठभेड़ जर्मन स्नाइपर से हो गयी। ये खुद को एक जमीन के अंदर छुपाई हुयी थी, दुश्मन का सिर्फ हेलमेट नजर आता था, इसने इंतेजार करना बेहतर समझा, अपने चेहरे के आगे इसने झाडी, कांटे पत्ते आदि रखे हुए थे। इस बीच एक दो गोली आयी जो इसके बगल से गुजर गयी पर इसके बाद भी चुपचाप लेटी सामने देखते रही। दूसरी तरफ भी स्नाइपर ही थे। एक घंटे बीते, दो घंटे बीते, घंटो बीत गए , दोपहर हो गयी... Lyudmila Pavlichenko बिना पलक झपकाये सामने दुश्मन के हेलमेट को देखते रही। जर्मन स्नाइपर के सब्र का बाँध टूट गया... वो बाहर निकल आया... और इसी के साथ Lyudmila Pavlichenko ने ट्रिगर दबा दिया... परफेक्ट शॉट और दुश्मन ढेर। कुल मिला कर इस दिन 36 दुश्मन इनके निशाने पर आये,एक के बाद एक.. ढेर लग गए।

अब तो जर्मन सेना में Lyudmila Pavlichenko एक खौफ बन चुकी थी, पूरी जर्मन सेना इसे इसके नाम से जानने लगी थी। युद्धक्षेत्र में जर्मन इसे इसका नाम लेकर चुनौती देते ... और अगले पल उनकी आवाज खामोश हो जाती। गोली सीधे भेजे के अंदर।।

ये विश्वयुद्ध काफी लंबा चला था, इस बीच इस युद्ध ने इसके पति को भी छीन लिया, ये भी मेजर थे। शादी के लिए दोनों ने लड़ाई के बीच में ही एक दूसरे को पसंद किया था।

कहते हैं पति के जाने के बाद Lyudmila Pavlichenko काफी क्रूर हो गयी। इसकी सबसे कामयाब तरीका ये था कि ये हमेशा किसी ग्रुप के सैनिक के पैर को निशाना बनाती , वो चीख कर गिर पड़ता, ऐसे में बाकी सैनिक जब उसकी मदद के लिए आते तो वो सबको मारते जाती।

दुर्भाग्य से जर्मन सेना ने जीत हासिल की, Lyudmila Pavlichenko battle ground से नहीं जाना चाहती थी... गोलियों से घायल अवस्था में इसे जबर्दस्ती खींच कर बाहर लाया गया और कहा गया कि युद्ध खत्म हो चूका है। हालाँकि कोई गिनती नहीं होती ऐसे में किसने कितने लोगों को मारा लेकिन ऑफिशली 309  विरोधी सैनिको को मारने का रिकॉर्ड इनके नाम दर्ज है।

Sunday, 30 October 2016

मुसलमानो की भयंकर मूर्ति पूजा

मुस्लमान हमेशा कहते हैं कि हम मूर्ति पूजा नहीं करते लेकिन .....
** अल्लाह की कोई भी प्रतीक चिन्ह बनाना बुतपरस्ती के तहत आता है चाहे वो मस्जिद बनाना हो या अल्लाह का नाम लिखना हो अथवा 786 लिखना हो

** काबा की तरफ मुंह करके नमाज या ध्यान लगाना ठीक वैसा ही है जैसे मूर्तिपूजक मूर्ति की तरफ ध्यान लगाते हैं

** हजरे असवाद को चूमना ठीक वैसा ही है जैसे क्रिश्चन JISUS का लॉकेट चूमते हैं.

** काबा के पत्थर को छूना क्या ठीक वैसा ही नहीं है जैसे हिन्दू शिवलिंग छूते हैं ....?????

** 86 या अल्लाह लिखना क्या हम हिन्दुओं के ॐ या स्वास्तिक लिखने की नक़ल नहीं है...???????

** ज़मज़म के पानी को पवित्र मानना क्या हुबहू हम हिन्दुओं के गंगा को पवित्र मानने जैसा नहीं हैं ?

** काबा में हिन्दुओं की तरह बिना सिलाई वाला एकरंगा कपडा पहनना , मक्का में मुंडन करवाना ..... ये सब क्या है...???

** चाँद - तारे को अल्लाह का चिन्ह मानना क्या है ...????

** दरगाह पर सड़े गले लाश के सामने अल्लाह -मौला का भजन गला फाड़ -फाड़ कर गाना............ क्या है...????

** आदम को अल्लाह का image मानना .....क्या है....????

** नबी (रसूल या मुहम्मद ) ,अपने माता- पिता या किसी व्यक्ति का सम्मान करना क्या पूजा की श्रेणी में नहीं आता है....????

दरअसल ये लोग हिन्दू ही थे सबकुछ अलग और विपरीत नियम बनाए लेकिन तरीका वही रह गया उसे बदलना संभव नहीं हुआ ..

स्नाइपर राइफल से सबसे ज्यादा मौत बांटने वाला

1925 की बात है, सिमो हाया एक साधारण से दिखने वाले व्यक्ति थे। 19 साल के इस आदमी की लंबाई  5′ 3″ थी। 350 दिन की आर्मी ट्रेनिंग खत्म हो चुकी थी। असल में इनका फुल टाइम जॉब खेती करना था और पार्ट टाइम में सेना की नौकरी । ये reserved केटेगरी में थे। याने आपने ट्रेनिंग लिया है, और कभी यिद्ध छिड़ा तो सेना उस वक़्त आपको कॉल कर सकती है।

33साल उम्र हो चुकी थी अब इन्होंने पूरी तरह खेती अपना लिया था और साथ में शिकार करके जानवर लाते थे जिसके मांस बेचने का कार्य करते थे। अचानक एक दिन ऐसा आया जब राइफल उठानी पड़ी।

सोवियत यूनियन ने फ़िनलैंड में घुसपैठ कर दी थी। नवम्बर 1939 में 4 लाख सोवियत सैनिकों ने हमला किया , फ़िनलैंड के पास कुल मिलाकर सिर्फ 80 हज़ार सैनिक थे। इसे WINTER WAR के  नाम से जाना जाता है। सिमो हाया ने सेना के पास जाकर अपना नाम लिखवाया, चूँकि वो बन्दूक से जानवरों का शिकार किया करते थे, इसलिए उनको "स्नाइपर" टीम में शामिल किया गया। इसके बाद तो आगे सब इतिहास है।

इनके पास उस समय की Model 28-30 नाम की राइफल थी। इस समय किसी को नहीं पता था कि ये विरोधी खेमे में इतना आतंक मचा देंगे। कुल मिला कर ऑफिशली इन्होंने उस युद्ध में 503 सैनिकों को मार गिराया था।

इन्होंने ऊंचाई पर जहां मोर्चा लिया वो दूर दूर तक बर्फ से ढका हुआ था। इन्होंने स्पेशल सफ़ेद वर्दी पहनी थी।  जो इस तरह डिजाईन की हुयी थी बर्फ के बीच ये नजर नहीं आते थे। इसके बाद ये बर्फ में थोड़ा सा गड्ढा करके लेट जाते , ऊपर से बर्फ रखते। स्नाइपर राइफल को भी बर्फ के अंदर रखते और सिर्फ उसकी नाल ऊपर होती। यहाँन तक कि चेहरे पर भी सफ़ेद नकाब रखते थे जिसमें सिर्फ आँखों के पास दो छेद होते थे।

युद्ध के दौरान सोवियत को अचानक लगा कि उनके बहुत सैनिक नहीं हैं, उन्होंने सोचा, युद्ध ही चल रहा है तो शायद मारे गए होंगे। लेकिन जल्दी ही एक खबर आयी कि कोई स्नाइपर है जिसे लोग "WIND OF DEATH" के नाम से बुलाते हैं उसी ने उनके सैनिकों को मारा है। इसके बाद सोवियत यूनियन ने भी फिर कुछ अपने स्नाइपर सैनिकों को भेजा पर कोई लौट कर नही आया... अब सिमो हाया मौत का दूसरा नाम बन चुके थे।

इसके बाद इसे मारने के लिए एक पूरी बटालियन भेजी गयी... और वही हुआ जिसका डर था... बहुत ही बड़ी क्षति हुई... बड़ी संख्या में सैनिक मारे गए और सिमो हाया का पता भी नही चला। अंत में सिमो पर बम्ब से हमले करके मारने को दल भेजा गया पर वो भी नाकाम रहे। अब तक सिमो के कई नाम पड़ चुके थे.. जिसमें "WHITE ऑफ़ DEATH" काफी प्रसिद्ध हुआ।

माना जाता है इनके कपडे ने इनकी सफलता में बड़ा योगदान दिया। ये सभी को देख सकते थे पर मीलों फैले बर्फ ये कहाँ पर हैं कोई देख नही पाता था। बर्फ में दबे इनके ऊपर निशाना लगाना भी सम्भव नहीं था, इनके अंदर नेचुरल निशानेबाजी की कला थी। बर्फ के अंदर से शांत स्थिर साँसों के साथ अपनी बाज जैसी आँखों से इन्होंने काफी ज्यादा सैनिक मारे लेकिन ऑफिशली 503 दर्ज है। स्नाइपर राइफल में सबसे ऊपर इनका ही नाम है। किसी ने सोचा नहीं था कि इतनी कड़ाके की ठंड में कोई बर्फ के अंदर पड़ा होगा।

बाद में युद्ध खत्म हुआ। दोनों देशों में अमन चैन हुयी तो खुद सोवियत सैनिकों ने इनसे कुछ दिन की ट्रेनिंग देने के लिए आग्रह किया। 96 साल की उम्र में 2002 को निधन हुआ। इनकी उस राइफल को लोग संग्रहालय में आज भी उत्सुकता से देखते हैं।

Saturday, 29 October 2016

पाकिस्तान का सबसे बड़ा हथियार भारतीय मुसलमान?

पाकिस्तान के पास जो सबसे बड़ा हथियार है वह उसका परमाणु बम नहीं, बल्कि वे 33 करोड़ मुसलमान हैं जो हमारे देश में रह रहे हैं. अब आप कहेंगे की ये तो 18 करोड़ है ...33नहीं तो आपका जो आंकड़ा है वो जनसंख्या के आधार पर है और मै उन्हें भी जोड़ रहा हूँ जो जनसँख्या में है ही नहीं क्यूँकी कौन जनसँख्या अधिकारी इनकी बस्तियों में घुस के सही से जनसँख्या का रिकॉर्ड बनाएगा ? आज तक नहीं बनाया है।

यह स्ट्रेटेजिक डॉक्ट्राइन 80 के दशक में जनरल जिया-उल-हक ने दी थी. उसने कहा था कि जब भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान हैं तो हमें अपने फौजी लड़ने के लिए भेजने की क्या जरूरत है?

तब से पाकिस्तान ने भारत के मुसलमानों को रेडिकलाइज (उग्र) करने में इन्वेस्ट (funding)करना शुरू किया. भारत की। कॉन्ग्रेस सरकार ने indirectly एक तरह से समर्थन दे दिया।

अगर बिलकुल कट्टर याने दंगाई मुसलामानों की भी जोड़ेंगे तो ये पूरे भारत की फौजों से तीस - पेंतीस गुना ज्यादा पड़ेंगे। अब अगर पाकिस्तान इन्हें भारत में दंगे-फसाद फैलाने का सिग्नल दे दे, तो आप कैसे संभालोगे?

बाकी के बचे मुसलमान भी या तो मूक दर्शक बनकर हवा का रुख भांपेंगे, या शोर मचाएँगे कि मुसलमानों के साथ कितना अत्याचार हो रहा है. वामपंथी पुरस्कार लौटाने लगेंगे और कांग्रेस जैसे दल सियार की तरह 'हुआँ हुआँ' करने लगेंगे। अगर दो-चार प्रतिशत मुसलमान सचमुच इसके विरोध में भी होंगे तो वे वैसे ही अप्रासंगिक होंगे जैसे 1947 के पहले थे.

भारत के अलग-अलग शहरों में किसी ना किसी बहाने से पचास हजार-एक लाख और ढाई लाख तक मुसलमान मारकाट करने को जुटे हैं, इसलिए कोई कल्पना मत समझिये। हाल ही में पश्चिम बंगाल मालदा की घटना आपके सामने है.
मुंबई के हिंसक प्रदर्शन आप देख चुके भुगत चुके हैं. कभी किसी हिन्दू त्योहार के मौके पर, या कहीं पैगम्बर से गुस्ताखी के विरोध के बहाने से. यह सब उसी मारक हथियार की मिकेनिज्म को दंगे के बहाने पाकिस्तान  टेस्ट करता है।

आतंकी हमलों के विरोध में पाकिस्तान पर आस्तीनें चढ़ाना अपनी जगह है. पर कोई लड़ाई छेड़ने से पहले यह सोच लीजिए कि उनके इस हथियार का आपके पास क्या जवाब है? इस लड़ाई को सरकार तो नहीं लड़ पायेगी, सब आपके हाथ होगा, क्योंकि सेना देश के हरेक मोहल्ले में तो नहीं जाएगी।

Friday, 28 October 2016

चीनी राष्ट्रपति ने नवाज को रो रो कर बताया दुखड़ा

चीनी राष्ट्रपति ने नवाज शरीफ को फोन किया..

चीन : क्या भाईजान.. मेड इन चाइना के बहिष्कार ने तो हालत ख़राब कर दी है।

पाकिस्तान : हमारी तो खुद हालत खराब है.. बॉर्डर पर एक के बदले दस मार रहा है..

चीन : साले तुमलोग हो ही अपशगुनी नापाक... ना मैं तेरे साथ होता ना आज इतना बड़ा नुकसान झेलना पड़ता...

पाकिस्तान : अरे पर... हमारा समर्थन करते रहो.. हम करेंगे कुछ.. भारत के मुस्लिम सब मेरे अपने हैं... सभी जिहाद के लिए तैयार हैं..

चीन : अच्छा.. तो कहो ना .. मेड इन चाइना के माल खरीदें ... plz भाईजान..

पाकिस्तान: अह.. वो मुस्लिम दीपावली मनाते नहीं ना तो कैसे खरीदेंगे...

चीन : कमीने हरामी तो क्या अब तेरे लिए मेड इन चाइना का सेवई बनाएं... खजूर बनाएं.... मेड इन चाइना के बकरी बनाएं जिसे तू काटेगा.. साले घटिया लोग .. घटिया त्यौहार... मैं तो डूब गया तेरे चक्कर में...

पाकिस्तान : धैर्य रखिये.. हम करेंगे कुछ...

चीन : अबे चुप कर..