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Tuesday, 16 January 2018

असली गब्बर सिंह तो पुलिस वालों के नाक काट लेता था

असली गब्बर सिंह बॉलीवुड के गब्बर (अमजद खान) से ज्यादा खतरनाक था। एक अंधविश्वास ने उसे इतना ज्यादा क्रूर बना दिया था कि चंबल में उसकी दशहत के शोले सच में दहकते थे।

अब शांत हो चुके चंबल के बीहड़ में 1950 के दशक में क्रूरता के पर्याय बन चुके गब्बर पर उप्र और मप्र सरकार ने क्रमश: 50-50 हजार रुपये, जबकि राजस्थान सरकार की ओर से 10 हजार रुपये का इनाम घोषित था।
भिंड के डांग गाव में 1926 को जन्मा गब्बर सिंह स्वभाव और कर्म से तो कुख्यात था ही, अंधविश्वास ने उसे और अधिक क्रूर बना दिया था। बताया जाता है कि एक तांत्रिक ने उससे कह दिया था कि अगर वह 106 व्यक्तियों की नाक काट कर अपनी इष्ट देवी को चढ़ाएगा तो पुलिस उसका एंकाउंटर नहीं कर सकेगी। उसके बाद से चंबल नदी के दोनों ओर के गांवों में हत्याओं के अलावा नाक काटने की घटनाएं होने लगीं। मचहौरी, भाकर, चमौदी, चिरनास्त आदि के क्रूरता पीड़ित जब भोपाल (मप्र) जा पहुंचे, तो विरोधी दल के नेताओं ने हंगामा कर दिया।

इससे तत्कालीन मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू के लिए राजनीतिक संकट पैदा हो गया। इसी बीच गब्बर ने अपनी मुखबिरी के मामले में गोहद विकासखंड के एक गांव में 21 बच्चों की लाइन लगवाकर हत्या कर दी। इस घटना से नेहरू सरकार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मप्र के तत्कालीन पुलिस प्रमुख को बुलाकर कहा था कि गब्बर के गैंग का सफाया किया जाए।

उसके बाद काटजू ने जब भी पुलिस अधिकारी मिलते, वह यही कहते- 'मुझे गब्बर चाहिए। चाहे मरा या जिंदा।'
अपने समय के प्रख्यात पत्रकार एवं सांसद जया भादुड़ी के पिता तरुण कुमार भादुड़ी ने यह समूचा घटनाक्रम नजदीकी से देखा था। बाद में जब शोले फिल्म की शूटिंग हुई तो इसके निर्माण में उनकी सक्रिय भूमिका रही। उन्होंने ही डायलॉग सुझाया था- 'मुझे गब्बर चाहिए। चाहे मरा या जिंदा..।

पुलिस वाले को मारना गब्बर सिंह को सबसे महंगा पड़ा। इस कृत्य के बाद से तो वह पुलिस के निशाने पर आ गया था। गब्बर सिंह के खात्मे का जिम्मा मप्र स्पेशल आम फोर्स के 26 वर्षीय डिप्टी सुपरिटेंडेंट आरपी मोदी ने लिया। उनके लिये सबसे मुश्किल काम था दस्यु प्रभावित क्षेत्र में मुखबिर तंत्र खड़ा करना, क्योंकि वहां गब्बर की दहशत से लोग पुलिस से दूरी बनाते थे। तभी एक घटना घटी, जिससे अचानक ही ये दूरियां खत्म हो गई। गांव के एक मकान में आग लग गई। शेखर नाम का एक बच्चा भी उसमें फंस गया। डीएसपी मोदी को सूचना मिली, तो वह पहुंचे और आग से घिरे घर में घुसकर शेखर को सुरक्षित निकाल लाए। इसके बाद से गांव वालों में उनकी छवि एक बहादुर इंसान की बन गई। देखते ही देखते ग्रामीण उनके करीब आ गए।

एक दिन गोहद के ही जगन्नाथ का पुरा गांव के मझरे गौम का पुरा में स्पेशल आर्म फोर्स ने श्री मोदी के नेतृत्व में 1959 में घेराबंदी कर गब्बर सिंह का एनकाउंटर कर दिया। इसमें जगत सिंह, रामदुलारे सहित गैंग के अन्य 9 डकैत भी मारे गए थे।