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Friday, 14 July 2017

दंगो में बचने के लिए कौन से हथियार और रणनीति

लगभग हरेक हिन्दू आजकल इस बात पर सहमति बना चुका है कि हिंदुओं के घरों में हथियार होने चाहिए.. कल इसी कड़ी में Tufail Chaturvedi जी ने भी अच्छा पोस्ट किया था। अब तो संशय इस बात पर भी नहीं है कि हथियार रखने चाहिए या नही.. संशय तो यह है कि कौन सा हथियार रखा जाए जिसे रखने से हम सुरक्षित भी हों और कानूनन दंडनीय भी ना हो।।

दोस्तों, क्यों ना आप सिर्फ एक कल्पना करें कि..
"आप घर मे महिलाओं और बच्चों के साथ हैं.. अचानक शोरगुल सुनते हैं और आपको पता चलता है कि करीब 5000 मुसलमान आआपके मुहल्ले में घुस चुके हैं.. अल्लाह हु अकबर के नारों के साथ किसी के सर पर लोहे से मारा जा रहा है, किसी के सर पर ईंट पटक दी जा रही है किसी को बुरी तरह लातों घूंसों से पीटा जा रहा है.. थोड़ी ही देर में महिलाओं के कपड़े तार तार होने लगते हैं.. आप रो सकते हैं, चीख सकते हैं, गिड़गिड़ा सकते हैं.. लेकिन बचा नहीं सकते ...अंततः.. आखिरी दृश्य ये होगा..

1. आप लहूलुहान पड़े हैं.. सामने मां बहन भी जिसकी इज्जत लूटी जा चुकी है।

2. आप आखिरी सांसें गिन रहे हैं.. अंधेरा छा रहा है, आपके सारे सपने खत्म हो चुके हैं. . ये भी याद आ रहा है कि.. कुछ लोग कहते थे कि ऐसा दिन आएगा पर आपने मजाक ही समझा था...

3. आप उस समय मोहल्ले में थे ही नहीं.. जब तक पहुंचे.. पूरी दुनिया बिखर चुकी थी..

4. आप मोहल्ले में थे.. ऐसे समय मे आपने बहुतों को बुलाने की कोशिश की पर आधे एक घण्टे में जब तक हेल्प मिलती .. सब मटियामेट हो चुका था..

हर किसी के साथ  एक अलग ही परिदृश्य होगा ये स्वाभाविक है। लेकिन सबके साथ एक सामान्य बात होगी कि कोई भी विरोध में सक्षम नहीं हो पाया..

मेरे हिसाब से तैयारी कैसी करनी चाहिए..

1. आप अपने मोहल्ले की सही लोकेशन समझ कर ये तय कीजिये कि आपके मोहल्ले से मुस्लिम मोहल्ले की दूरी क्या है ..
2. डंडा, लोहे के रॉड, हॉकी स्टिक आदि तो होने ही चाहिए..
3. कुछ भी पेट्रोल जरूर रखिये.. अगर बाइक है तो बहाना भी हो जाएगा कि आपातकालीन समय के लिए पेट्रोल रखा था..
4. चाकू रखिये लेकिन शायद आपके ही परिवार वाले इसे ना रखने दें क्योंकि हिंदुओं में यही तो मूर्खता है.. तो ठीक है अच्छा उपाय बताता हूँ.. बड़े स्क्रू खोलने के लिए काफी बड़े बड़े और हैवी पेंचकस आते हैं.. वो रखिये...
5. सबसे महत्वपूर्ण बात अपने आसपास के बजरंग दल, विहिप, आरएसएस आदि सारे संगठनों से जाकर मिलिए और नम्बर लीजिये तथा कभी डिस्कस भी कीजिये कि ऐसी स्थिति के लिए क्या निर्देश है ? उनके पास अच्छे विकल्प होते हैं.. क्योंकि वो जिहादियों से बराबर निपटते रहते हैं।
6. महत्वपूर्ण बात जितने ज्यादा लोगों को अपने जैसे  कट्टर हिंदूवादी बना सकते हैं वो बनाइये.. क्योंकि जान लीजिए सिर्फ़ वही लोग आपको मदद के लिए आएंगे..
6. दोस्तों आखिरी बात ज्यादा जोश में ना आये.. फिल्मी प्रभाव में ना पड़िये.. मान लीजिये किसी ने कहा कि "अल्लाह हु अकबर" कहो.. तो कह दीजिये.. कुछ भी बोलने को कहे तो कहिये.. लेकिन आपने उन सबका चेहरा पहचान लिया है.. बड़ा प्रतिशोध लिया जा सकता है.. अगर मर गए तो खेल खत्म हो जाएगा.. जिंदा बच गए तो उसका खेल खत्म हो जाएगा.. और खेल उसका खत्म करना है , अपना नहीं... क्योंकि गलत लोग वो हैं आप नहीं।।

कुल मिलाकर आप अपने हिसाब से सोचिए जैसे मान लीजिये कि आप घेराबंदी या फूलों की क्यारियां लगाने के बहाने लोहे के इस तरह से तार बिछा सकते हैं जिसमे ठीक समय पर विद्धुत प्रवाह किया जा सके.. और घर के आंगन में घुस चुके 30 - 40 लोग जो भी हों वो निकल ही ना सकें...

अब बाकी आप सब खुद समझदार हैं. अंततः याद रखिये दुनिया मे हम हिन्दू ही हैं जिनको मुसलमानों के खिलाफ विजय मिलती आयी है. लेकिन आज जिस तरह से हमारी सोच और रहन सहन है.. उससे तो हम सिर्फ मारे जा सकते हैं.. जल्दी कीजिये.. देर ना हो जाये.. मोदी और योगी जी से उम्मीद मत रखिये... आपके मरने के बाद  आपको दो पैसे देंगे.. इससे ज्यादा कुछ नहीं।

Wednesday, 10 August 2016

संस्कृत से ही बनी पूरी दुनिया की भाषा

संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी माना जाता है, लेकिन अब अलग-अलग धर्मों की अलग-अलग भाषा हो चली है जबकि संस्कृत से ही सभी यूरोपीय भाषाओं का जन्म हुआ। 

संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। 'संस्कृत' का शाब्दिक अर्थ है 'परिपूर्ण भाषा'। संस्कृत से पहले दुनिया छोटी-छोटी, टूटी-फूटी बोलियों में बंटी थी जिनका कोई व्याकरण नहीं था और जिनका कोई भाषाकोष भी नहीं था। कुछ बोलियों ने संस्कृत को देखकर खुद को विकसित किया और वे भी एक भाषा बन गईं।


संस्कृत भाषा के व्याकरण ने विश्वभर के भाषा विशेषज्ञों का ध्यानाकर्षण किया है। उसके व्याकरण को देखकर ही अन्य भाषाओं के व्याकरण विकसित हुए हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों के अनुसार यह भाषा कम्प्यूटर के उपयोग के लिए सर्वोत्तम भाषा है। मात्र 3,000 वर्ष पूर्व तक में संस्कृत बोली जाती थी तभी तो ईसा से 500 वर्ष पूर्व पाणिनी ने दुनिया का पहला व्याकरण ग्रंथ लिखा था, जो संस्कृत का था। इसका नाम 'अष्टाध्यायी' है। यदि संस्कृत व्यापक पैमाने पर नहीं बोली जाती तो व्याकरण लिखने की आवश्यकता ही नहीं होती।
अष्टाध्यायी जिसमें 8 अध्याय और लगभग 4 सहस्र सूत्र हैं। व्याकरण के इस महनीय ग्रंथ में पाणिनी ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4,000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संग्रहीत किए हैं। 19वीं सदी में यूरोप के एक भाषा विज्ञानी फ्रेंज बॉप (14 सितंबर 1791-23 अक्टूबर 1867) ने पाणिनी के कार्यों पर शोध किया। उन्हें पाणिनी के लिखे हुए ग्रंथों तथा संस्कृत व्याकरण में आधुनिक भाषा प्रणाली को और परिपक्व करने के सूत्र मिले। आधुनिक भाषा विज्ञान को पाणिनी के लिखे ग्रंथ से बहुत मदद मिली। दुनिया की सभी भाषाओं के विकास में पाणिनी के ग्रंथ का योगदान है।
1100 ईसवीं तक संस्कृत समस्त भारत की राजभाषा के रूप सें जोड़ने की प्रमुख कड़ी थी। संस्कृत को उस काल में कुछ लोग ब्राह्मी लिपि में तो अधिकतर देवनागरी लिपि में लिखते थे। भारत में आज जितनी भी भाषाएं बोली जाती हैं वे सभी संस्कृत से जन्मी हैं जिनका इतिहास मात्र 1500 से 2000 वर्ष पुराना है। उन सभी से पहले संस्कृत, प्राकृत, पाली, अर्धमागधि आदि भाषाओं का प्रचलन था।
भारत में आज जितनी भी भाषाएं बोली जाती हैं, वे सभी संस्कृत से जन्मी हैं जिनका इतिहास मात्र 1500 से 2000 वर्ष पुराना है। उन सभी से पहले संस्कृत, प्राकृत, पाली, अर्धमागधि आदि भाषाओं का प्रचलन था।
आदिकाल में भाषा नहीं थी, ध्वनि संकेत थे। ध्वनि संकेतों से मानव समझता था कि कोई व्यक्ति क्या कहना चाहता है। फिर चित्रलिपियों का प्रयोग किया जाने लगा। प्रारंभिक मनुष्यों ने भाषा की रचना अपनी विशेष बौद्धिक प्रतिभा के बल पर नहीं की। उन्होंने अपने-अपने ध्वनि संकेतों को चित्र रूप और फिर विशेष आकृति के रूप देना शुरू किया। इस तरह भाषा का क्रमश: विकास हुआ। इसमें किसी भी प्रकार की बौद्धिक और वैज्ञानिक क्षमता का उपयोग नहीं किया गया।
संस्कृत ऐसी भाषा नहीं है जिसकी रचना की गई हो। इस भाषा की की गई है। भारत में पहली बार उन लोगों ने सोचा-समझा और जाना कि मानव के पास अपनी कोई एक लिपियुक्त और मुकम्मल भाषा होना चाहिए जिसके माध्यम से वह संप्रेषण और विचार-विमर्श ही नहीं कर सके बल्कि जिसका कोई वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार भी हो। ये वे लोग थे, जो हिमालय के आसपास रहते थे।
उन्होंने ऐसी भाषा को बोलना शुरू किया, जो प्रकृतिसम्मत थी। पहली दफे सोच-समझकर किसी भाषा का हुआ था तो वो संस्कृत थी। चूंकि इसका आविष्कार करने वाले देवलोक के देवता थे तो इसे देववाणी कहा जाने लगा। संस्कृत को देवनागरी में लिखा जाता है। देवता लोग हिमालय के उत्तर में रहते थे।



धरती और ब्रह्मांड में गति सर्वत्र है चाहे वस्तु स्थिर हो या गतिमान। गति होगी तो ध्वनि निकलेगी, ध्वनि होगी तो शब्द निकलेगा। देवों और ऋषियों ने उक्त ध्वनियों और शब्दों को पकड़कर उसे लिपि में बांधा और उसके महत्व और प्रभाव को समझा।
संस्कृत विद्वानों के अनुसार सौर परिवार के प्रमुख सूर्य के एक ओर से 9 रश्मियां निकलती हैं और ये चारों ओर से अलग-अलग निकलती हैं। इस तरह कुल 36 रश्मियां हो गईं। इन 36 रश्मियों के ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने। इस तरह सूर्य की जब 9 रश्मियां पृथ्वी पर आती हैं तो उनकी पृथ्वी के 8 वसुओं से टक्कर होती है। सूर्य की 9 रश्मियां और पृथ्वी के 8 वसुओं के आपस में टकराने से जो 72 प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न हुईं, वे संस्कृत के 72 व्यंजन बन गईं। इस प्रकार ब्रह्मांड में निकलने वाली कुल 108 ध्वनियों पर संस्कृत की वर्ण माला आधारित है।
ब्रह्मांड की ध्वनियों के रहस्य के बारे में वेदों से ही जानकारी मिलती है। इन ध्वनियों को अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के संगठन नासा और इसरो ने भी माना है।
कहा जाता है कि अरबी भाषा को कंठ से और अंग्रेजी को केवल होंठों से ही बोला जाता है किंतु संस्कृत में वर्णमाला को स्वरों की आवाज के आधार पर कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अंत:स्थ और ऊष्म वर्गों में बांटा गया है। 

Friday, 10 June 2016

हिन्दू पलायनवादी है इसलिए कैराना और कश्मीर होता है।

अच्छा चलो, मान लो कल मामले के हाईलाइट होने की वजह से अखिलेश सरकार पुलिस का जमघट लगवा देती है कैराना में। दुसरी तरफ मोदी जी भी सेना के जवानो को भेज देते हैं कैराना में। और तो और आरएसएस, बजरंग दल, विहिप आदि के लोग भी पहुँच जाते हैं कैराना में।

सभी हिंदुओं को उनके घर वापिस दिला दिए जाते हैं, उनकी दुकानें वापिस खुलवा दी जाती हैं, आने जाने के रास्ते पर पुलिस खड़ी कर दी जाती है, और इस तरह से कैराना के हिंदुओं को वापिस बसा दिया जाता है।

एक दिन गुजरा, दो दिन गुजरा, सप्ताह गुजरे, महीना भी गुजरा........ तो क्या अब सेना के जवान, पुलिस सब जिंदगी भर वहीँ रहेंगे ? जाहिर है वो चले जाएंगे........ उसके बाद ? ? फिर भाग जाओगे ?.... फिर पुलिस आएगी ? फिर भाग जाओगे.... फिर पुलिस आएगी.... फिर.... फिर....

फिर तो हिंदुओं तुम्हारा पलायनवादी दृष्टिकोण उचित ही है।

कैराना और कश्मीर का जवाब रणवीर सेना के इतिहास से सीखिये

मैं बार बार रणवीर सेना के इतिहास के बारे में बताता हूँ जो आज हिंदुओं की जरुरत है। 90 के दशक में जब नक्सलियों ने याने दलितों और मुल्लों ने चुन चुन कर भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण जैसे अगड़ी जातियों का सामूहिक नरसंहार शुरू कर दिया था। बिहार में हाहाकार मचा था। जो सवर्ण अपने गाँव जाता वो लौट कर नहीं आता था। जो गाँव में थे सब भाग कर शहर आ गए थे। पूरा बिहार कश्मीर और कैराना बन चुका था। अपनों की लाश जलाने के लिए भी गाँव  में जाने की हिम्मत नहीं थी। लाखों एकड़ जमीन परती पड़ी थी। प्रशासन लालू की थी इसलिए सुनने वाला कोई नहीं था। ये वर्ग लालू का वोटर नहीं था इसलिए लालू वामपंथियों के साथ मिलकर इसका नामोनिशान मिटा देना चाहता था।

लेकिन सवर्णों में एक बुजुर्ग ने सीना ठोंका, एक छोटी सी जगह पर कुछ लोगों के साथ बैठक की, और हाथों में हथियार उठाने का संकल्प लिया। इतना अपमान बर्दाश्त ना था। सबसे पहले कुछ सवर्णों ने अपने लाइसेंसी हथियार आगे किये और सहायता दी। इसके बाद जो हुआ वो इतिहास बन गया। खून की नदी बाह चली। नक्सलियों की क्रूरता भी इनकी क्रूरता के सामने बौनी पड़ गयी। उस वक़्त बिहार सरकार में हाशिये पर गए कई बीजेपी नेताओ का समर्थन मिलना शुरू हो गया। रणवीर सेना का नाम सुनकर बड़े बड़े पुलिस अधिकारीयों के हाथ पाँव फूल जाते थे। मंत्री विधायक सांसदों में खौफ समा गया था।

नक्सली जो कल तक कहीं भी किसी सवर्ण को मारकर निश्चिन्त रहते थे, वो अब एक भी सवर्ण को मारने के पहले दस बार सोचते थे, क्योंकी एक के बदले दस अपने मारे जाएंगे ये तय था। पुरे बिहार में अमन चैन लौट आया। नक्सली वापिस भाग कर बंगाल में घुस गए। लाखों सवर्ण अपने गाँव लौट कर खेती करने लगे। सभी के अंदर गर्व का भाव था, सभी निर्भय हो चुके थे। वह बुजुर्ग आदमी ब्रह्मेश्वर मुखिया लोगों के लिए अवतार बन कर आये।
आज का कोई भी हिन्दू संगठन रणवीर सेना जैसा नहीं। ये भी सच है कि यहां रणवीर सेना की स्थापना तब हुयी जब पानी सर से ऊपर गुजर चूका था और जीने का रास्ता सिर्फ हथियारों से होकर जाता था।

यही एकमात्र तरीका है, कोई पार्टी कोई नेता साथ नहीं देगा। लेकिन जब खड़े होंगे तो मैं आस्वस्त हूँ पूरी दुनिया से समर्थन मिलेगा। हिंसा का जवाब अहिंसा पहले भी कभी नहीं था, ना आज है।

Wednesday, 4 June 2014

मरने के कितने दिनों बाद आत्मा पहुंचती है यमलोक, क्या होता है रास्ते में?

 हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद स्वर्ग-नरक की मान्यता है। पुराणों के अनुसार जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, उसके प्राण हरने देवदूत आते हैं और उसे स्वर्ग ले जाते हैं, जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसके प्राण हरने यमदूत आते हैं और उसे नरक ले जाते हैं, लेकिन उसके पहले उस जीवात्मा को यमलोक ले जाया जाता है, जहां यमराज उसके पापों के आधार पर उसे सजा देते हैं। 

मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार जाती है। इसका विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में है। गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार मनुष्य के प्राण निकलते हैं और किस तरह वह प्राण पिंडदान प्राप्त कर प्रेत का रूप लेते हैं। जानिए यमदूत किस प्रकार किसी मनुष्य के प्राण निकालते हैं और उसे किस प्रकार यातना देते हुए यमलोक तक ले जाते हैं-

गरुड़ पुराण के अनुसार जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोलने की इच्छा होने पर भी बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसमें दिव्यदृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियां नष्ट हो जाती हैं और वह जड़ अवस्था में हो जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगते हैं और लार टपकने लगती है। पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग से निकलते हैं। 

उस समय दो यमदूत आते हैं। वे बड़ी भयानक क्रोधवाली आंखों वाले होते हैं। उनके हाथ में पाशदंड रहता है। वे अपने दांतों से कट-कट करते हैं। यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं। उनका मुंह बहुत भयानक होता है, नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। यमराज के दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मल-मूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है, जिसे यमदूत पकड़ लेते हैं।
 गरुड़ पुराण के अनुसार जब यमदूत किसी आत्मा को यमलोक ले जाते हैं तो सबसे पहले वे यमपुरी के द्वार पर स्थित द्वारपाल को इसकी सूचना देते हैं। द्वारपाल चित्रगुप्त को बताते हैं और चित्रगुप्त जाकर यमराज को कहते हैं।

- तब यमराज चित्रगुप्त से उस पापात्मा के अच्छे-बुरे कर्मों का हिसाब पूछते हैं। तब चित्रगुप्त श्रवण नाम के गणों से उस पापात्मा के विषय में जानकारी लेते हैं। श्रवण नामक देवता ब्रह्माजी के पुत्र हैं। ये स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक आदि में भ्रमण करते हैं और मनुष्य के अच्छे-बुरे कर्मों को देखते हैं।

 यमराज के दूत उस शरीर को पकड़कर पाश गले में बांधकर उसी क्षण यमलोक ले जाते हैं, जैसे- राजा के सैनिक अपराध करने वाले को पकड़ कर ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी यमराज के दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाले दुखों के बारे में बार-बार बताते हैं। यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते हैं। 

- इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी हो अपने किए हुए पापों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है और वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है। तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। फिर उठ कर चलने लगता है। इस प्रकार यमदूत उस पापी को अंधकार वाले रास्ते से यमलोक ले जाते हैं।

गरुड़ पुराण के अनुसार यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई मापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है चार कोस यानी 13-16 कि.मी)। वहां यमदूत पापी जीव को थोड़ी ही देर में ले जाते हैं। इसके बाद यमदूत उसेभयानक  यातना देते हैं। इसके बाद वह जीवात्मा यमराज की आज्ञा से यमदूतों के साथ पुन: अपने घर आती है।

 घर आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा करती है परंतु यमदूत के बंधन से वह मुक्त नहीं हो पाती और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी को तृप्ति नहीं होती क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से युक्त होकर वह जीव यमलोक जाता है।

 इसके बाद पापात्मा के  पुत्र आदि परिजन यदि पिंडदान नहीं देते हैं, तो वह प्रेत रूप हो जाती है और लंबे समय तक निर्जन वन में रहती है। इतना समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना उसे मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। गरुड़ पुराण के अनुसार मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह कोपुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नौवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है, दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।

गरुड़ पुराण के अनुसार शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल को भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन से गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से ह्रदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नौवें और दसवें दिन से भूख-प्यास आदि उत्पन्न होती है। ऐसे पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेत ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है।

 यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन २०० योजन चलता है। इस प्रकार वह 47 दिन लगातार चलकर यमलोक पहुंचता है। इस प्रकार मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है। 

 इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार हंै- सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद आगे यमराजपुरी आती है। पापी प्राणी यम, पाश में बंधे हुए मार्ग में हाहाकार करते हुए अपने घर को छोड़कर यमराज पुरी जाते हैं।
साभार : bhaskar.com