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Sunday, 12 August 2018

क्या दलितों का लालच देश खत्म करने पर आमादा है ?

मुस्लिमों के लिए चाहे कुछ भी किया जाए वो भाजपा को वोट नहीं करते... इसी तरह दलितों के लिए आप कुछ भी करो.. पर उनकी प्राथमिकता में पहले लालू, अखिलेश, माया होगी.. उसके बाद ही भाजपा आती है...
उसी क्रम में देखा जाए तो सवर्ण समाज के लिए सबसे पहले भाजपा ही है.. उसके बाद ही कोई और...

भाजपा देशभक्तों की पार्टी मानी जाती है तो इसके पीछे कारण भी उचित हैं... मुस्लिम और दलित हमेशा अपने नेताओं के माध्यम से देशविरोधी एजेंडे में शामिल हो जाते हैं... भले ही वो इनकार करें... जबकि देशहित के मुद्दे पर भाजपा को सिर्फ सवर्णों का साथ मिलता है...

इसमें भी अगर अंतर करना हो तो सिर्फ इतना कह सकते हैं कि मुस्लिम को देशविरोध के लिए किसी नेता, मौलवी या किसी कारण की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि मुस्लिम होना ही भारतीय संस्कृति और देश का विरोध मान लेना पर्याप्त है.. इस पर कोई चाहे तो बहस कर सकता है..

वहीँ दूसरी तरफ दलितों को समझने के लिए ऐसे समझिये,  मान लीजिए कि....
"आपकी नजर किसी दुकान में रखे हीरे जड़ित जेवर पर है.. आपकी पूरी इच्छा है कि काश ये मेरा होता... अचानक एक आदमी आये और कहे कि भाई.. देखो चारों तरफ.. ना कोई गार्ड है, ना cctv, ना कोई परिंदा... तू दुकान तोड़ के ले सकता है..
किसी ने उकसाया, माहौल मिला और सारी नैतिकता को ताक पर रखकर आप दुकान से "चोरी" करने को हमला कर देते हो... "

दलित यही कर रहे हैं.. कोई आता है और कहता है.. निराश क्यों हो ? तू ये भी ले सकता है, वो भी ले सकता है, इसको भी जेल भेज सकता है. .. और उसको भी.. बस मुझे वोट दो .. मैं उस दुकान (देश) पर हमला करने का माहौल बना दूंगा..
दलित अपने कदम आगे बढ़ा देता है.. लालच बुरी बला है...

आज देश के नेता .. देश के लिए राजनीति नहीं कर रहे.. ना फैसले ले रहे हैं.. वो वोट की राजनीति कर रहे हैं... क्योंकि अगर नहीं करेंगे.. तो दलित या मुस्लिम चोरी ना करने देने के लिए उस पार्टी को वोट नहीं देंगे...
आप चोरी करने दो.. तो ही वोट देंगे... ये अलग बात है इस चोरी को वो अपना "मूल अधिकार" जैसे शब्द देते हैं..

हम भाजपा को भी दोष क्यों दें अगर आज देश की ये स्थिति है.. मान लो कि कोई ऐसी पार्टी आ जाये जो देश हित की बात करता है तो दलित और मुस्लिम वोट नहीं करेंगे, ऐसे में वो हार जाएगी..

समस्या ये भी है कि दलितों का लालच सुनामी की तरह मुंह फाड़े आगे बढ़ता जा रहा है.. वो इसके लिए मुस्लिम जैसे संस्कृति विहीन और लुटेरी कौम के साथ गलबहियां करके सबकुछ मिटा देने पर आमादा हैं... 

खास बात तो ये है, मुस्लिम ... दलितों को साथ लेकर सवर्णों से निपट रहे हैं... देश पर कब्ज़ा करने के लिए राह का रोड़ा सिर्फ सवर्ण है.. वो दलित नहीं जो आए दिन छोटी छोटी मांगों के लिए इस्लाम अपनाने की धमकी देते हैं.. या अपना भी लेते हैं.. उनके लिए धर्म मायने रखती ही नहीं.. वो बहन से भी निकाह कर लेंगे और गौमांस भी खा लेंगे...
तभी तो भीम और मीम का रिश्ता परवान चढ़ रहा है... मीम ने हिन्दू समाज के एक महत्वपूर्ण किले को अपनी ताकत बना लिया है.. हम ये भी कह सकते हैं कि अंबेडकर ने जो पौधा लगाया था वो जहरीला पेड़ बन चुका है...

क्योंकि मुस्लिम को पता है कि एक बार देश पर कब्ज़ा हो जाये तो ये दलित हमारे सामने संघर्ष कर ही नहीं पाएंगे.. आधे तो यूँही इस्लाम स्वीकार कर लेंगे.. और बाकी आधे काट दिए जाएंगे.. पाकिस्तान में कितने हिन्दू दलित हैं ?

अब इसके बाद वर्तमान की चर्चा करें तो मोदी सरकार चार साल में किसी भी मोर्चे पर सफल नहीं दिख रही... लेकिन विचारणीय ये भी तो है कि जब देश के अंदर इस तरह की जनता हो तो कौन सी सरकार सफल होगी ? ?

Sunday, 22 April 2018

मुसलमानों को अभी रोक लो वरना कुछ नहीं बचेगा

मेरा स्पष्ट मानना है कि हिन्दू कभी भी मुस्लिम कौम के साथ नहीं रह सकती... ये तेल और पानी का मिश्रण है.. इतिहास तो जो है वो है.. वर्तमान में भी यही सच है... ऐसा इसलिए क्योंकि आप मुस्लिमों को ऐसे किसी भी काम से रोक नहीं सकते जो हिंदुओं में बिल्कुल ही त्याज्य है... और सारे फसाद की वजह यही है...

जैसे कि आप उनको गाय ना काटने के लिए राजी नहीं कर सकते...
वो आपके भगवान या किसी आस्था पर विश्वास करें या इज्जत करें... ये भी नहीं हो सकता...
वो जिहाद के उपक्रम में हिन्दू लड़कियों को निशाना ना बनाएं ये भी असम्भव है..
वो हिंदुओं को काफ़िर ना मानें तो वो मुसलमान ही नहीं कहलायेंगे...
वो जनसँख्या जिहाद करके हिंदुओं से ऊपर निकलने की कोशिश नहीं छोड़ सकते..
मुसलमानो का नेता हमेशा वही होगा जो हिंदुओं के खिलाफ काम करेगा.. और हिंदुओं का नेता हमेशा उनका प्रमुख दुश्मन होगा...
वो हमेशा दुश्मन देश के प्रति वफादार रहेंगे.. क्योंकि भारत एक काफिरों के जनतंत्र वाला देश है..
ये अलग घर चाहते हैं, अलग मोहल्ले चाहते हैं, अलग गांव शहर और राज्य चाहते हैं..
इनका पहनावा, रहन सहन सब अलग है और रहेगा...

सवाल है कि जब इतने सारे अंतर हैं तो घुलना मिलना सम्भव कैसे है ? ना विचार मिलते हैं ना कार्यकलाप ? क्या सिर्फ "मुंहजबानी एकता" के भरोसे चलते रहेंगे ?

ये ठीक है कि ये लोग इतने अंदर तक जड़ें जमा चुके हैं कि मुस्लिम मुक्त भारत जैसे विचार हास्यास्पद लगते हैं... परन्तु ये सच है कि जहां आप 20 करोड़ मुस्लिमों को हटाने के बारे में  निराश हो जाते हैं वहीं ये लोग हिन्दू मुक्त भारत बनाने के लिए दिन रात प्रयत्नशील है .. पूरी उम्मीद के साथ.. और इसका नतीजा है.. हर दिन... बहुत सारे स्थानों से हिंदुओं का पलायन...

इसके लिए ये लोग जो तरीके अपनाते है  उसका कोई तोड़ नहीं है.. याने लव जिहाद और जनसँख्या जिहाद...
संविधान के अनुसार इसे रोका नहीं जा सकता और हिन्दू इतने जागरूक नहीं है... 18% से जिस दिन 40 %होंगे.. जो कि होना ही है उस दिन तीसरा तरीका अपनाएंगे.. "डायरेक्ट एक्शन".. जो बंगाल केरल आदि में हो रहा है.. इसके बाद मामला हाथ से निकल जायेगा.. क्योंकि उस वक़्त ये अपने ही एक- दो करोड़ लोगों की बलि चढ़ा देने से हिचकेंगे नहीं.. और ये काम हिंदुओं के लिए नामुमकिन है... 

अब रास्ता क्या है ? रास्ता एक ही है.. और सिर्फ यही है.. आज के आज जागो और 18% पर ही एक्शन लो.. क्या करना है.. कैसे रोकना है.. और हमेशा के लिए आने वाले खतरे से निजात पाना है.. उसपर सोचो और कार्य करो..

Tuesday, 20 March 2018

मोसुल में मारे गए लोग अपनी मौत के खुद जिम्मेदार

मोसुल देश मे जो कुछ भी हुआ उसके जिम्मेदार वे लोग खुद हैं जो इस्लामिक देशों में गए थे..
अगर मैं किसी ऊंचे पर्वत पर चढ़ने जाऊं और फिसल कर मर जाऊं तो इसका दोषी कौन होगा ? मेरा परिवार ? उस जिला का जिलाधिकारी या मुख्यमंत्री ?  क्या मुझे पता नहीं था कि सड़क पर चलने में और पर्वत पर चढ़ने में अंतर होता है ?

क्या ये लोग जानते नहीं थे कि इस्लामिक देशों में हिंदुओं, ईसाइयों, बौद्धों आदि के लिए दुश्मनी का भाव होता है ? क्या उनको इस्लामिक देशों के शरीया कानून का पता नहीं ? क्या उनको ईशनिंदा जैसे कानून की जानकारी नहीं ? क्या उनको मुसलमानों के चरित्र के बारे में पता नहीं ?
तो कौन हुआ जिम्मेदार ?

मुझे कोई 1 करोड़ रुपये महीने भी दे तो इस्लामिक देशों में पैर नहीं रखूंगा.. जिन देशों में आपको पूजा पाठ करने को ना मिले.. जहां का हरेक मुसलमान आपको हलाल करने की नजर से घूरता मिले... वहां भी अगर आप कमाने जाते हो तो पैसे की जगह मौत ही मिलेगी... इसमें सुषमा स्वराज और मोदी जी कुछ नहीं करेंगे क्योंकि ये आत्महत्या है.. इसमें कोई दूसरा दोषी नहीं हो सकता..
#मोसुल #ISIS

Friday, 19 January 2018

अगर पाकिस्तान नहीं बनता तो आज हिन्दू नहीं होते

कुछ हिंदूवादी इस बात पर बहुत रोते हैं कि भारत का विभाजन हो गया.. पाकिस्तान बन गया.... लेकिन अगर पाकिस्तान नहीं बनता तो क्या आज यहां हिन्दू जीवित होते ? सिर्फ विभाजन को लेकर जब मुसलमानो ने भारत में चारों तरफ दंगे शुरू किये थे तब गली गली में हिंदुओं की लाशें बिछा दी थीं.. (इसमें दलित भी थे)...
कभी सोचा है आपने 1947 से अबतक उनकी जनसंख्या क्या हो गयी होती ? ?
1947 में भी ये बची खुची जनसंख्या ही थी... जो आज मुसीबत बन गयी है...
जब उसी वक़्त विभाजन के पहले इन्होंने अपनी असलियत दिखा दी थी ... लाखों हिंदुओं को मार डाला था.. तो उसी वक़्त हिंदुओं को इतनी दूरदृष्टि हो जानी चाहिए थी कि आगे जा के फिर क्या होने वाला है ? ये तो कहना ही पड़ेगा कि हिन्दू इस मामले में एक मुर्ख संप्रदाय है।

आज वो थोड़े से लोग जब ज्यादा हुए तो कश्मीर लिया, बंगाल लिया, केरल लिया, और यूपी, बिहार की बारी है... ये सच्चाई है, इसको नकारना सच से मुकरना है... ये थोड़े से लोग ? ? लेकिन अगर आज पुरे पाकिस्तान के लोग यहां होते तो ? सारे बड़े आतंकी नेटवर्क भारत में होते, बड़े बड़े डॉन यहीं होते...विश्वप्रसिद्ध आतंकवादी भारत में होते... ना जाने कितने लीडर और शायद pm भी वही होते तो क्या लगता है आपको आज हिन्दू यहां होते ? बचे होते क्या ? मुझे तो नहीं लगता... शायद अस्तित्व खत्म हो गया होता... उसी हाल में होते जैसे पाकिस्तान में हैं.. एक्का दुक्का... याने हिंदुओं का पन्ना खत्म हो गया होता.. अरे आज जब ये थोड़े से बचे हुए मुस्लिम नहीं सम्भलते तो पूरे पाकिस्तान के यहां घुसे होने की स्थिति में क्या होता ? ?

विभाजन गलत था.. लेकिन हिंदुओं के अस्तित्व के लिए एक मौका भी था.. जैसे उधर पाकिस्तान में हिंदुओं को खत्म कर दिया गया वैसे ही इधर हिंदुओं को भी वैसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए थी... ये मौका था.. बहुत कम उनकी जनसंख्या थी... आजादी के बाद से ही निपटना शुरू करते तो अबतक शायद कहानी खत्म हो गयी होती...

मेरे हिसाब से तो विभाजन हिंदुओं को तात्कालिक रूप से नयी जिंदगी दे गया... और ये मुसलमानों के लिए बड़ी बेवकूफी थी.. क्योंकि अगर उन्होंने विभाजन नहीं किया होता तो आज पूरा भारत उनके हाथों में होता और एक इस्लामिक राष्ट्र होता।

Sunday, 20 August 2017

इजराइल ने 11 हत्याओं के बदला सैकड़ों से लिया

हम सब जानते हैं कि जब 1972 में इजराइल के  ओलिंपिक खिलाड़ियों को आतंकवादियों ने मार दिया था तब इस्राएल ने भी सबको खोज खोज कर मारा... लेकिन इसमें कई आश्चर्यजनक जानकारी भी है.. जैसे कि जिन आतंकियों ने इसरायली खिलाड़ियों के ऊपर हमला किया था.. उन सबको तो एयरपोर्ट पर ही मार दिया गया था... फिर खोज खोज कर किसको मारा गया था ? ?

कहानी तो वहीं एयरपोर्ट पर खत्म हो जानी चाहिए थी...  जब मुस्लिम आतंकियों को भागते समय इस्राएली कमांडो ने एयरपोर्ट पर घेर लिया.. उसी वक़्त खुद को घिरा देख एयरपोर्ट पर ही बंधक खिलाड़ियों को आतंकियों ने भून डाला.. इसके बाद इसरायली कमाण्डो ने 8 आआतंकवादियों को वहीं मार डाला..खेल खत्म हो चुका था... लेकिन नहीं इजराइल ने तो इसका बदला सैकड़ों को मार कर लिया..

उसने अपनी खुफिया एजेंसी मोसाद की मदद से उन सभी लोगों के कत्ल की योजना बनाई, जिनका वास्ता ऑपरेशन ब्लैक सेंप्टेंबर से था। इस मिशन को नाम दिया गया  ‘रैथ ऑफ गॉड’ यानी ईश्वर का कहर।

दो दिन के बाद इजरायली सेना ने सीरिया और लेबनान में मौजूद फलस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन के 10 ठिकानों पर बमबारी की और करीब 200 आतंकियों को तो मारा ही सैकड़ों आम नागरिकों को भी मौत के घाट उतार दिया।

मिशन शुरू होने के कुछ ही महीनों के अंदर मोसाद एजेंट्स ने वेल ज्वेटर और महमूद हमशारी का कत्ल कर सनसनी मचा दी।

हुसैन अल बशीर नाम का ये शख्स होटल में रहता था, और होटल में वो सिर्फ रात को आता था और दिन शुरू होते ही निकल जाता था। मोसाद की टीम ने उसे खत्म करने के लिए उसके बिस्तर में बम लगाने का प्लान बनाया।

बम लगाना कोई मुश्किल काम नहीं था, ये काम तो आसानी से हो गया। मुश्किल ये था कि कैसे ये पता किया जाए कि हुसैन अल बशीर बिस्तर पर है  तभी धमाका किया जा सकता है। इसके लिए एक मोसाद एजेंट ने बशीर के ठीक बगल वाला कमरा किराए पर ले लिया। वहां की बालकनी से बशीर के कमरे में देखा जा सकता था। रात को जैसे ही बशीर बिस्तर पर सोने के लिए गया। एक धमाके के साथ उसका पूरा कमरा उड़ गया।

इसके बाद फलस्तीनी आतंकियों को हथियार मुहैया कराने के शक में बेरूत के प्रोफेसर बासिल अल कुबैसी को गोली मार दी गई। मोसाद के दो एजेंट्स ने उसे 12 गोलियां मारीं।

9 अप्रैल 1973 को इजराय़ल के कुछ कमांडो लेबनान के समुद्री किनारे पर स्पीडबोट के जरिए पहुंचे। इन कमांडोज को मोसाद एजेंट्स ने कार से टार्गेट के करीब पहुंचाया। कमांडो आम लोगों की पोशाक में थे, और कुछ ने महिलाओं के कपड़े पहन रखे थे। पूरी तैयारी के साथ इजरायली कमांडोज की टीम ने इमारत पर हमला किया। इस ऑपरेशन के दौरान लेबनान के दो पुलिस अफसर, एक इटैलियन नागरिक भी मारा गया।।इनमें साइप्रस में जाइद मुचासी को एथेंस के एक होटल रूम में बम से उड़ा दिया गया।

इतने लोगों को मौत की नींद सुलाने के बाद मोसाद कुछ समय के लिए रुका क्योंकि कमांडोज में दो तीन घायल भी थे और थक गए थे.. नए कमांडोज शामिल हुए.. क्योंकि अभी मुस्लिम आतंकियों की लिस्ट में नाम बाकी थे..

28 जून 1973 को ब्लैक सेप्टेंबर से जुड़े मोहम्मद बउदिया को उसकी कार की सीट में बम लगाकर उड़ा दिया।
15 दिसंबर 1979 को दो फलस्तीनी अली सलेम अहमद और इब्राहिम अब्दुल अजीज की साइप्रस में हत्या हो गई।
-17 जून 1982 को पीएलओ के दो वरिष्ठ सदस्यों को इटली में अलग-अलग हमलों में मार दिया गया।
23 जुलाई 1982 को पेरिस में पीएलओ के दफ्तर में उप निदेशक फदल दानी को कार बम से उड़ा दिया गया।
-21 अगस्त 1983 को पीएलओ का सदस्य ममून मेराइश एथेंस में मार दिया गया।
-10 जून 1986 को ग्रीस की राजधानी एथेंस में पीएलओ के डीएफएलपी गुट का महासचिव खालिद अहमद नजल मारा गया।
-21 अक्टूबर 1986 को पीएलओ के सदस्य मुंजर अबु गजाला को काम बम से उड़ा दिया गया।
-14 फरवरी 1988 को साइप्रस के लीमासोल में कार में धमाका कर फलस्तीन के दो नागरिकों को मार दिया गया।

मोसाद के एजेंट्स दुनिया के अलग-अलग देशों में जाकर करीब 20 साल तक हत्याओं को अंजाम देते रहे।
अगली नंबर था अली हसन सालामेह का, वो शख्स जो म्यूनिख कत्ल-ए-आम का मास्टरमाइंड था लेकिन अबतक इसने अपनी सुरक्षा काफी बढ़ा ली थी...

मोसाद ने सलामेह को लेबनान की राजधानी बेरूत में ढूंढ़ निकाला। 22 जनवरी 1979 को एक कार बम धमाका कर सलामेह को भी मौत के घाट उतार दिया गया।

इन कमांडोज में एक बेंजामिन नेतन्याहू भी था।

बदले की ये भावना कि आप 20 साल तक अपना इंतकाम पूरा करते रहें.. ये सिर्फ इजराइल में हो सकता था.. भारत के सेक्युलर और डरपोक नेताओं से तो ऐसी कोई कल्पना ही नहीं कि जा सकती।।

Friday, 19 August 2016

कश्मीर के मैदान में अब अजीत डोभाल

अब कश्मीर के मैदान में गब्बर की  ENTRY हो चुकी है। कश्मीर का मामला डोभाल जी को दे दिया गया है। दो सूत्री मार कुटाई की योजना केंद्र सरकार ने पारित कर दी है। अब रक्षा मंत्री , गृह मंत्री कश्मीर मामले में बैक टू पवेलियन हो गए हैं। सीमा पार के घुसपैठ से निपटने के लिए "सख्त" कदम उठाये जाएंगे। ये डोभाल जी वाला "सख्त" है।

⚔ नो टॉलरेंस की नीति..

⚔ बलूचिस्तान के लोगों से संपर्क कर मोदीजी के बयान को वास्तविक रूप देना...

⚔ सीमा सुरक्षा और घुसपैठ पर नयी नीति...

⚔ पाकिस्तानी झंडे लहराने वालों के लिए विशेष कार्यक्रम...
सेना की नयी रणनीति तैयार....

और सबसे आखिर में अमरनाथ यात्रा पर लगाए गए 75000 सैनिकों को कश्मीर में ही रुकने को कहा गया है... .. पता नहीं क्या होने वाला है... अल्लाह खैर करे...

Saturday, 13 August 2016

क्या कश्मीर में आर या पार वाली स्थिति है?



कश्मीर में अब शांति आने वाली नहीं है। वहाँ आजादी की जंग छिड़ी है। आजादी भारत से, आजादी हिंदुओं के शासन से। इसकी वजह मोदीजी भी हैं क्योंकि उनकी नीति कांग्रेस वाली नहीं है। हमें सोचना चाहिए कि भाई ये मुसालमान पाकिस्तान से कश्मीर को मिलाये जाने के पक्ष में क्यों है.... जबकि पाकिस्तान में ज्यादा गरीबी, बेरोजगारी और रोज फटते हुए बम हैं ? ? आखिर सोचिये तो सही कि ऐसा कौन सा जुल्म भारत ने इनके ऊपर किया है .... उल्टा इन्होंने ही लाखों हिंदुओं को मारा काटा रेप किया और विस्थापित किया ?

मुसलमानों का कहना है कि ये उनके मजहब की बेइज्जती है कि उनके ऊपर शासन करने वाला कोई हिन्दू हो, चाहे वो मनमोहन हो या मोदी। इस्लाम में ये डूब मरने वाली बात या पाप होता है कि मुस्लमान किसी काफ़िर के देश में रहे। आखिर पाकिस्तान को जिन्ना ने यह साफ़ कहके माँगा था कि मुसलमान हिंदुओं के साथ नहीं रह सकते। उन्होंने देश का नाम ही "पाक" याने पाकिस्तान रखा कि अब जा के हम पाक हुए याने शुद्ध मुसलमान बने। यही पाक मुसलमान बनने के लिए कश्मीर में सभी एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।

ये सब मुमकिन था भी.... लेकिन मोदी जी के आने के बाद नामुकिन होता जा रहा है, अलगाववादी नेताओं को ये दिख गया कि इतने सालों से कश्मीर में बिछाए गए नेटवर्क और बनाये गए ताकत का इश्तेमाल नहीं किया तो ये मोदी अंदर ही अंदर सारे नेटवर्क को मिटा देगा और ताकत को इतना कम कर देगा कि एक जुलुस निकालना भी संभव नहीं हो पायेगा, क्योंकि मोदीजी कुछ काम अंदर ही अंदर करते रहते हैं बिना हल्ला किये, इसकी वजह है विपक्षी पार्टियों की अलगाववादियों से सहानुभूति और मीडिया का हाहाकार।


लेकिन इस वक़्त कश्मीर का जो माहौल है वो आर या पार वाला बन चूका है, महीने भर से ऊपर हो चुके हैं, कई थाने जला दिए गए हैं, मिलिट्री कैम्पो पर लगातार अटैक हो रहे हैं, कितने ही थाने पुलिस-विहीन हो चुकी है, सेना अपना आक्रमक रुख खत्म कर चुकी है क्योंकि ये कोर्ट और विपक्षी दलों की मांग है, नतीजा पुरे कश्मीर में अब आतंकियों का कब्ज़ा है, 15 अगस्त के दिन पाकिस्तान दिवस मनाने की जबरदस्त तैयारी चल रही है, पाकिस्तानी झंडे बनाये जा रहे हैं, झंडे लहराने वाले स्थलों का निर्माण पुरे कश्मीर के हरेक मोहल्ले में चालू है.... अब आगे मोदीजी के पास क्या विकल्प है , ये मुझे भी नहीं पता क्योंकि वो भी मीडिया और विपक्षी पार्टियों के जबर्दस्त दवाब में हैं।

Thursday, 11 August 2016

शाहरुख़ खान को आतंकवादी होने के संदेह में पकड़ा जाता है ?

शाहर्रुख खान एक मुस्लमान है और इसलिए अगर उनको बार बार अमेरिकी एयरपोर्ट पर पकड़ कर आतंकवादी होने के संदेह में जांच की जाती है तो इसमें कुछ गलत नहीं है। किसने कहा कि अगर कोई सेलिब्रिटी है तो वो आतंकवादी नहीं है ? हफ्ते भर पहले एक बड़ी क्रिकेट टीम का कप्तान रंगें हाथ आतंकवाद में लिप्त पाया गया, उसे मौके पर दबोचा गया और उसने स्वीकार भी कर लिया। सेलिब्रिटी है तो वो देशभक्त ही होगा ये कोई कानून है क्या ?

देखा जाए तो नवाज शरीफ भी सेलिब्रिटी की श्रेणी में हैं और सारे आतंकवादियों का संरक्षक भी। जाकिर नाइक भी सेलिब्रिटी था जिसका आईएसआईएस से रिश्ते का पक्का सबूत मिल चुका है। आमिर खान ने पीके फिल्म बनाया और आतंकवादी देश पाकिस्तान को अच्छा बताने की कोशिश की, दूसरे धर्म को नीचे गिराने और खत्म करने के लिए जी जान लगा दी। पाकिस्तान क्रिकेट टीम में योहाना सहित कई खिलाडियों का जीवन इस्लाम की वजह से बर्बाद हो गया। ओवैसी भी भारत के बड़े नेता होने की वजह से सेलिब्रिटी है लेकिन सब जानते है कि आतंकवाद उसकी रग रग में घुसी पड़ी है।

अमेरिका ने मूल कारणों को समझ लिया है, वो जानता है कि हरेक मुस्लिम कुरआन पढता है और उसी किताब में जिहाद की प्रेरणा देने वाले आदेश है याने मुस्लमान है तो कुरआन पढ़ेगा, कुरआन पढ़ेगा तो जिहाद वाले पेज तो पढ़ेगा ही, और पढ़ेगा तो वैसा विचार होगा ही होगा, तो भाई गिरफ्तार कर के जांच करो इसकी। असल में ऐसी कड़ाई तो भारत में होनी चाहिए थी। खैर....

एक सेक्युलर प्राणी की क्लास

एक sick-ular मिल गया आज... बोलने लगा वही रटा रटाया डायलाग....
"अरे भाईजी सारे मुसालमान ऐसे नहीं है, जो अनपढ़ है, सिर्फ वो गलत रास्तों पर चल रहे हैं..

मैने कहा...
"भाईजी.... सड़क पर कभी देखा है कि जो अनपढ़ है वो फुटपाथ पर नहीं बल्कि सड़क के बीच मोटरगाड़ियों के साथ चल रहे हो ? ?"

"हैं जी.... नहीं... ऐसा नहीं देखा...."

"तो ये सब चोंचले है, सिर्फ उनको बचाने का... जब वो किसी पर गोली चलाते हैं तो क्या अनपढ़ होने की वजह से उनको ये ज्ञान नहीं होता कि ये मर जायेगा ? इसका परिवार अनाथ हो जायेगा ? "

"लेकिन अनपढ़... को इससे क्या मतलब...."

"ठीक है कुरआन में लिखा है कि गैर मुस्लिम को मारो.... है ना ??"

"अह.... हाँ लिखा है ..."

"अगर लिखा है ... और वो अनपढ़ है तो उसने कुरआन पढ़ा कैसे ? ?"

"हैं जी.... ये तो... किसी दूसरे ने पढ़ के समझा दिया होगा.. मौलवी मौलाना...."

"तो आप तो खुद मान रहे हो कि मौलवी मौलाना पढ़ा लिखा है, अनपढ़ नहीं है और आतंकवादी तैयार करता है... फिर क्यों कहते हो कि अनपढ़ लोग ऐसा करते हैं ..."

"हाँ लगता तो है पर...

"पर क्या... मदरसे में पढ़ाई ही होती है ना ? किताब कॉपी, ब्लैकबोर्ड, सब होते हैं वहाँ.. पूरी टेक्नोलॉजी का इश्तेमाल कर रहे हैं, झंडे पर दीवाल पर वो क्या क्या लिखते है... तो क्या अनपढ़ लिखता है ये सब ? अनपढ़ का मतलब समझाओ मुझे... फिर ... सवसे पढ़ा लिखा ये लोग खुद मानते थे कि जाकिर नाइक है फिर वो भी आतंकवादी कैसे निकला ? "

"हैं जी.... हैं जी.... वो ... अच्छा चलता हूँ। "

Wednesday, 10 August 2016

मेरे घर में घुसे सांप ने मुझे बेघर किया।

एक बार मेरे कमरे में 5-6 सांप घुस गए। मैं परेशान हो गया, उसकी वजह से मैं कश्मीरी हिंदुओं की तरह अपने ही घर से बेघर होकर बाहर निकल गया। इसी बीच बाकी लोग जमा हो गए।  मैंने पुलिस और सेना को बुला लिया। 
अब मैं खुश था कि थोड़ी देर में सेना इनको मार देगी तभी मेनका गांधी आ गयी, बोली नहीं आप गोली नहीं चला सकते, मैं पेटा के तहत केस कर दूंगी। 

सेना वाले उसको ढेला मारने लगे, सांप भी उधर से मुंह ऊँचा करके जहर फेंकने लगे। एक दो सांप ने तो एक दो सैनिक को काट भी लिया पर भागे नहीं। फिर इतने में कुछ पडोसी मुझे ही बोलने लगे, क्या भाई तुम भी बेचारे सांप पर पड़े हो, रहने दो , क्यों भगा रहे हो ? उधर मोदीजी ने खबर भिजवा दिया, सांप को मुंह में जहर नहीं होना चाहिए, उसके मुंह में दूध दे दो तो वो मुंह से जहर की जगह दूध फेंकेगा। ..... मैं हैरान परेशान... फालतू में बात का बतंगड़ हो चूका था। न्यूज़ भी चलने लगे थे। रविश ने कह दिया कि सबको जहर नजर आता है सांप नजर नहीं आता, उसकी भी जिंदगी है।

इसी बीच एक सैनिक ने पेलेट गन चला दिया और एक सांप ढेर हो गया, मुझे आशा जगी, सेना ही कुछ कर सकती है, तभी गुलाम नबी ने कहा, पेलेट गन क्यों चलाया, सांप को कष्ट हो रहा है, अभी कोई कुछ सोचता तब तक हाइकोर्ट का भी फैसला जाने कहाँ से आ गया कि पेलेट गन नहीं चला सकते सांप पर। उधर आम आदमी पार्टी ने कह दिया कि वहाँ जनमत संग्रह हो कि उस घर में सांप रहेगा या आदमी। सांप को जीने का हक़ है इस पर सब एकमत हो गए थे। 

इतने में जो मेरा पडोसी मेरा घर कब्ज़ा करना चाहता था वो सांप के लिए दूध और छिपकली मेढक लेकर आ गया , उसको खिलाने लगा, उसकी मदद मेनका गांधी, ग़ुलाम नबी ने कर दी और पडोसी को शाबाशी दी। 

मैं निराश होकर अब दूर से सिर्फ देखता था। काश मैंने खुद लाठी लेकर शुरू में ही भुरकस निकाल दिया होता तो आज ये दिन ना देखना पड़ता।।

क्या करें हिंदूवादी ? ?

हिन्दू अपने देश में कमजोर हैं..... अब सच तो यही है। पर अब ये नहीं होगा इसकी तैयारी करनी चाहिए।

सबसे सीधा रास्ता है, अपने जैसे लोगों को तैयार करके जबर्दस्त एकता का परिचय देना होगा। हमारी सहायता के लिए कम से कम इस वक़्त ना सरकार है, ना पुलिस, ना नेता, ना कोई जाति समूह, ना दूसरे मजहब के लोग।। विश्वास ना हो तो कश्मीरी हिंदुओं को देख लो, इनके तरफ से कोई नहीं है।

जातिवाद मिटायेंगे, दलितों में हिंदुत्व का भाव जगायेंगे, ये सब फालतू की बात है, ये कार्य हज़ारों साल में नहीं हुआ था, जिन दलितों को या किसी भी जाति को समझदारी होगी वो खुद जुड़ेगा, हम इतना कर सकते है कि भेदभाव नहीं करेंगे। इससे ज्यादा क्या करेंगे ? वैसे भी अब ये सब पुरानी बात है, बस इसे खींचा जा रहा है, मुफ्त की सुविधा और वोट के लिए।

सवर्णो की समस्या है कि वो इस्लाम कभी इस्लाम स्वीकार नहीं कर सकते, जबकि दलितों के सामने ये समस्या नहीं है, वो बौद्ध धर्म में जा सकते हैं तो इस्लाम में क्यों नहीं ? ? तो समस्या ख़ास लोगों को ही है और शुरुआत इनको ही करना पड़ेगा।

जब बात करते हैं शुरुआत की तो लोग डर जाते हैं क्योंकि वो लड़ना नहीं चाहते, घायल होना या संपत्ति का नुक्सान नहीं चाहते, लेकिन वो तो एक दिन होना ही है चाहो या मत चाहो। बावजूद इसके मैं किसी ऐसी लड़ाई की बात नहीं कह रहा, क्योंकि ये वक़्त ऐसी लड़ाई का है भी नहीं। जिस दिन शारीरिक लड़ाई का वक़्त आयेगा उस दिन तो आपको ना चाहते हुए भी हथियार के साथ बाहर कदम रखना पड़ेगा।

फिलहाल लड़ाई मानसिक है, इसको लड़ना पड़ेगा, इस वक़्त वो लोग खुद को मजबूत करने में लगे हैं, क्योंकि उनका लंबा प्रोग्राम एक योजना के तहत चलता है, जैसे कि नए नए मस्जिद बनाना, मोहल्ले बढ़ाते जाना, बाजार के ज्यादातर दूकान खरीदना या किराया पर लेना, सऊदी में किसी सदस्य को भेजकर यहाँ अमीर होना, कट्टरता का विस्तार , आतंकियों का समर्थन और अपने स्तर से सहायता, और इन सबके लिए अपने नेताओं की संख्या राज्यसभा व् लोकसभा में बढ़ाना इत्यादि।

आप क्या कर रहे हैं ? आप भी कीजिये। मंदिरों में दान देते हैं, थोड़ा सा हिन्दू संगठनों को दीजिये, 50 रूपये ही दीजिये, 100 रुप्येही दीजिये। सबसे ज्यादा कमजोर हिन्दू यहीं से है जबकि सबसे ज्यादा अमीर लोग देश में हिन्दू ही हैं। पर कोई धर्म के लिए सही जगह 100 रुपये नहीं देना चाहता। साईं बाबा पर रुपये , सोना चांदी चढ़ाते हो , दंगे में साईं बाबा बचाने नहीं आएंगे। उस वक़्त वो छोटे छोटे संगठन ही बचाने आएंगे जिनको आपने कभी एक रूपया नहीं दिया होगा पर जान की कीमत उनके ऊपर निर्भर होगी।

अभी की लड़ाई सिर्फ ताकत बढ़ाने की चल रही है, इसमें हमसब पीछे है क्योंकि कोई गाइड लाइन नहीं है। अभी से कमाते रहिये, जैसे जी रहे हैं वैसे ही जीते रहिये लेकिन थोड़ा परिवर्तन करने का समय है। अगर भविष्य देख सकते हो तो देखो, तुम्हारे और उनके बीच सिर्फ तुम्हारी 'जनसंख्या' है इसी वजह से उन्होंने कदम रोक के रखे है वो भी अगले 20 साल में बदल जायेगा, फिर ? ? क्योंकि वो तुम्हारी बराबरी में आने का इंतज़ार नहीं कर रहे, वो 50-50 का अनुपात हो ऐसा नहीं चाहते, जिस दिन 30-70 भी आ गया तो लड़ाई सड़कों पर आ जायेगी।